इंस्पायरिंग:  सपने अचानक पूरे नहीं होते… उनके पीछे लगातार मेहनत और प्रोसेस होती है – अभिषेक शर्मा
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इंस्पायरिंग: सपने अचानक पूरे नहीं होते… उनके पीछे लगातार मेहनत और प्रोसेस होती है – अभिषेक शर्मा

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भारतीय क्रिकेटर इन दिनों अपने बेस्ट फॉर्म में हैं और खूब रन बना रहे हैं। उनके इस सफर से जुड़ी खास बातें…
मेरे पापा क्रिकेटर थे। वो चाहते थे मैं भी क्रिकेटर बनूं। शुरुआत वहीं से हुई। लेकिन यह सपना पूरी तरह मेरा तब बना, जब साल 2007 में मैंने युवराज सिंह को इंग्लैंड के खिलाफ टी-20 मैच में छह गेंदों पर छह छक्के लगाते देखा। उसी पल मुझे लगा कि मुझे भी अपने देश के लिए खेलना है।
रास्ता साफ नहीं था। रोज अभ्यास, रोज वही मैदान, वही थकान। लेकिन एक बात साफ थी… रुकना नहीं है। वक्त के साथ युवराज सिंह केवल मेरे आदर्श नहीं रहे, मेरे मेंटर बने। उन्होंने मुझसे कहा, ‘मैं तुम्हें रणजी या आईपीएल के लिए नहीं, इंडिया के लिए ट्रेन कर रहा हूं’। जब भी आत्मविश्वास डगमगाता है, ये शब्द मुझे खुद पर भरोसा करना सिखाते हैं।
मेरा और पापा का रिश्ता सिर्फ रन और विकेट तक सीमित नहीं रहा है। जब इंडिया के लिए मेरा चयन हुआ, उस दिन पापा का रिएक्शन बहुत शांत था। उन्होंने बस मुझे गले लगाया और कहा कि जमीन से जुड़े रहो, ये तो बस शुरुआत है। आज भी मुझे याद है, उस दिन उनकी आंखों में कितना गर्व था, लेकिन उतनी ही शांति भी।
पापा की यही शांति उनकी सबसे बड़ी ताकत है, खासकर ऐसे दौर में जहां उम्मीदों का दबाव बहुत ज्यादा होता है। वो कभी नतीजों से नहीं डिगे। मैंने शतक लगाया या शून्य पर आउट हुआ, वो हमेशा वैसे ही रहे। उनकी नजर इस बात पर अधिक रहती है कि मैं कैसा इंसान बन रहा हूं।
क्रिकेट में हर दिन एक जैसा नहीं होता। कभी स्कोर साथ देता है, कभी नहीं। मेहनत दिख रही थी, लेकिन हर मैच में रन नहीं बन रहे थे। फिर भी युवी पाजी हमेशा कहते थे कि प्रोसेस फॉलो करो। यही प्रोसेस आज भी मेरी सबसे बड़ी ताकत है।
2024 मेरे लिए बहुत बड़ा साल रहा… आईपीएल में सबसे ज्यादा छक्के, इंडिया के लिए टी-20 डेब्यू और दूसरे ही मैच में शतक। लेकिन इसके साथ दबाव भी आता है। लंबे टूर्नामेंट में जब चीजें आपके मुताबिक नहीं जातीं, तो सोशल मीडिया से दूरी बनाना जरूरी होता है। क्योंकि क्रिकेट में, खासकर भारत में, लोग भावुक होते हैं।
मेरा मानना यह है कि इस सफर में हर चीज का एक समय होता है। लक्ष्य हमेशा रहते हैं, लेकिन उनके पीछे भागना नहीं चाहिए। आज अगर मैं कुछ कह सकता हूं, तो बस यही कि सपने अचानक पूरे नहीं होते। चार साल की उम्र से शुरू हुआ सफर, हर दिन की मेहनत, सही लोगों का साथ और अपने प्रोसेस पर भरोसा… यही असली जीत है। धैर्य और ईमानदारी जैसे संस्कार मायने रखते हैं
मुझे मेरे पिता की खूबियों ने बहुत प्रेरित किया है। उनका धैर्य, उनकी ईमानदारी और लोगों से सम्मान और अपनेपन के साथ पेश आना। मैं कोशिश करता हूं कि यही संस्कार अपने साथ रखूं, चाहे मैं ड्रेसिंग रूम में हूं या मैदान के बाहर। जैसे-जैसे करियर आगे बढ़ रहा है, मुझ पर निगाहें भी बढ़ रही हैं, उम्मीदें भी। लेकिन मैं आज भी खुद को संभाले रख पाता हूं, तो उसकी सबसे बड़ी वजह पिता का साथ है। जब चीजें भारी लगने लगती हैं, तो मैं उन्हीं बातों की ओर लौट जाता हूं, जो उन्होंने मुझे सिखाई हैं। (तमाम इंटरव्यूज में…)



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