एन. रघुरामन का कॉलम:  आप अपनी रिटायरमेंट लाइफ कैसे बिताना चाहते हैं?
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एन. रघुरामन का कॉलम: आप अपनी रिटायरमेंट लाइफ कैसे बिताना चाहते हैं?

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रवि और राधा (काल्पनिक नाम) की शादी तब हुई थी, जब रवि 26 साल के और राधा 22 की थीं। शादी के 38 सालों में उन्होंने हर चीज आपसी बातचीत से तय की। दोनों जिस पर राजी हुए, वो काम पूरा किया। उन्होंने एक घर का ही नहीं, बल्कि अपने शहर से 200 किमी दूर एक हॉलिडे होम का भी लोन चुका दिया। दो बच्चों को पाला-पोसा और सेटल कर दिया। अच्छा-खासा पेंशन फंड भी बना लिया, जिससे कम से कम एक इंटरनेशनल ट्रैवल और आधा दर्जन घरेलू छुट्टियों का खर्च निकल सकता है। बाकी वीकेंड वे हॉलिडे होम में बिताते थे। आज 67 साल के रवि और 63 साल की राधा की एक अलग समस्या है। उन्होंने यह प्लान ही नहीं किया कि रिटायरमेंट के बाद क्या होगा। राधा के पास रिटायरमेंट के बाद के कामों की सूची थी और रिटायर होते ही उन्होंने शुरू भी कर दिए। जबकि रवि का रिटायर होने का इरादा नहीं था। अंतत: जब उन्होंने रिटायरमेंट पर बात शुरू की तो एहसास हुआ कि दोनों अलग दिशाओं में सोच रहे हैं। इन दोनों की भांति कई लोगों के लिए रिटायरमेंट प्लानिंग एक नंबर एक्सरसाइज जैसी होती है- कितना पैसा है, कितना चाहिए, कितने समय तक चलेगा और टैक्स कम करने के लिए इसे कैसे खर्च करें? जबकि कपल्स को सोचना यह चाहिए कि मौजूद पैसे को वे कितने लंबे समय तक एंजॉय कर सकते हैं। लेकिन असल में होता यह है कि तीन दशकों तक बचत के एक्सपर्ट बन चुके कपल्स को पता ही नहीं होता कि पैसे को किस चीज पर खर्च किया जाए। मैंने ज्यादातर कपल्स में रवि जैसी सोच देखी है- 60 की रिटायरमेंट उम्र के बाद 2 साल का एक्सटेंशन पाने की जी-तोड़ कोशिश। फिर 3 साल पार्ट टाइम और 68 तक कंसल्टिंग। उसके बाद यथासंभव गिग एम्प्लॉयमेंट, ताकि बचत में कमी न हो। पहले लोग तय उम्र में रिटायर हो जाते थे। उसके बाद काम बंद। आज चीजें बदल गई हैं। अपेक्षाकृत लंबे जीवन के साथ लोग अधिक फ्लेक्सिबली काम कर रहे हैं। अलग-अलग उम्र में रिटायर हो रहे हैं और महज अपनी ही नहीं, बल्कि पैरेंट्स की सम्पत्ति भी पा रहे हैं। इससे सामाजिक ताना-बाना बदल गया है। वे सिर्फ पैसे के लिए काम नहीं करते। रवि जैसे लोगों को काम से स्ट्रक्चर, स्टेटस, सोशल कनेक्शन और उद्देश्य भी मिलता है। लेकिन जब काम बंद होता है तो ये चीजें अपने आप ट्रांसफर नहीं होतीं। कुछ लोगों को यह बदलाव आजादी जैसा लगता है तो कई दूसरों को अस्थिर करने वाला। और रिटायरमेंट के बाद यदि एक पार्टनर पहचान खोने से जूझ रहा हो, जबकि दूसरा समृद्ध है तो यह असंतुलन रिश्ते पर दबाव डालता है। यह सलाह दी जाती है कि कपल्स इन सवालों के जवाब खोजें : आप कब और कैसे काम बंद करना चाहते हैं? तब एक सामान्य हफ्ता कैसा होगा? कोई छुट्टी वाला या रोमांटिक नहीं, बल्कि साधारण बुधवार कैसा होगा? आप क्या करेंगे? कहां रहेंगे? दोनों को कौन-सी चीज उद्देश्य या जुड़ाव का भाव देगी? कौन-सा पैसा किसका है और महीने का खर्च कहां से आएगा? जब आय नियमित सैलरी की जगह पेंशन, बचत और गिग वर्क से आने लगे तो यह सवाल पहले से ज्यादा मायने रखता है कि किसके कंट्रोल में क्या है और कौन आर्थिक रूप से सुरक्षित महसूस करता है। आप दोनों किस बात से डरते हैं? शायद पैसे खत्म हो जाने से, उद्देश्य खोने से, बोझ बन जाने से या जो चाहते हैं, वह करने से पहले ही मर जाने से। क्या होगा यदि आपमें से किसी को देखभाल की जरूरत पड़े या कोई पहले गुजर जाए? क्या जिंदा बचा पार्टनर जानता है कि सब कुछ कहां है? उसे सारी बचत और सम्पत्ति की जानकारी है? इन पर बातचीत नहीं करने के गंभीर नतीजे हो सकते हैं। फंडा यह है कि पैसा बेहद जरूरी है, लेकिन पैसा इसलिए है कि आपको बेहतर जिंदगी दे सके। और रिटायरमेंट से आप दोनों क्या चाहते हैं, इस पर बात किए बिना आप साझा खुशहाल जीवन की योजना नहीं बना सकते।



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