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बिना ठीक से यह तय किए कि क्या खरीदना है, शॉपिंग का अपना ही मजा है। आप दीपावली गिफ्ट खरीदने निकलते हैं और लौटते वक्त आपको कोई नई स्वीट शॉप, कम जानी-पहचानी गली, खूबसूरत बिल्डिंग, दिलचस्प व्यक्ति और शायद कोई ऐसा दोस्त भी मिल जाता है, जिसकी आपको जरूरत थी, लेकिन आपको कभी एहसास ही नहीं हुआ। लेकिन अब इस खुशी की जगह मोबाइल लेता जा रहा है। आज हम घर से निकले बिना हर चीज खरीद सकते हैं। हम प्राइस कंपेयर करते हैं, रिव्यू पढ़ते हैं, प्रोडक्ट वीडियो देखते हैं, डिस्काउंट जांचते हैं और चंद क्लिक में ऑर्डर कर देते हैं। हमारा शॉपिंग कार्ट तो भरा है, लेकिन शहर का अनुभव खाली हो रहा है। याद कीजिए, जब शॉपिंग का मतलब आसपास की जगहों को जानना भी होता था। आपको पता होता था कि अच्छे कपड़े किस दुकान पर हैं, ताजी मिठाई कहां बनती है और अच्छे फुटवियर कहां मिलेंगे। शॉपिंग महज कुछ खरीदने तक सीमित नहीं थी। यह घर से बाहर की दुनिया को जानने का मौका भी थी। इस दीपावली हमें यह आदत फिर से अपनानी चाहिए। ऑर्डर के लिए एप खोलने के बजाय आसपास नजर दौड़ाएं। हो सकता है आपको घर के पास कोई नई दुकान, हैंडमेड प्रोडक्ट बेचने वाला कोई युवा आंत्रप्रेन्योर, खूबसूरती के साथ संवारी गई कोई पुरानी इमारत या ऐसी कोई गली दिख जाए, जहां से आप सैकड़ों बार गुजरे, लेकिन कभी गौर नहीं किया। बाजार में शॉपिंग की खूबसूरती यही है कि यह हमें ऐसे लोगों और जगहों से मिलाती है, जिन्हें कोई एल्गोरिदम हमेशा रिकमेंड नहीं कर सकता। आप दुकान में जाते हैं तो किसी से बात करते हैं। सवाल पूछते हैं, कहानियां सुनते हैं और जानते हैं कि क्यों कोई खास चीज अलग तरीके से बनाई गई है। कभी-कभी किसी क्राफ्ट का इतिहास भी जानते हैं। लखनऊ में किसी चिकनकारी विक्रेता, मुंबई के फूलवाले, मुरादाबाद के ब्रासवेयर कारोबारी, कोलकाता के मिठाई बनाने वाले से बातचीत और चेन्नई में कांजीवरम साड़ी बुनने का तरीका जानना आपको शहर के बारे में ऐसी बातें सिखा सकता है, जो किसी शॉपिंग एप से नहीं मिलेंगी। बार्गेनिंग का भी अपना मजा है। यह हमें पैसे की कीमत, बातचीत का हुनर और कभी-कभी यह स्वीकार करना भी सिखाती है कि सामने वाले को भी रोजी-रोटी कमानी है। इससे भी जरूरी यह है कि बाहर निकलना हमें शहर का बेहतर नागरिक बनाता है। हम नई सड़कें, इमारतें, सार्वजनिक जगहें, ईटरीज और नए मोहल्ले देखते हैं। नए स्वाद चखते हैं, अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों से मिलते हैं और समझते हैं कि हमारा शहर कैसे बदल रहा है। शहर से हमारा जुड़ाव बढ़ता है। इस आदत का मानवीय पहलू भी है। त्योहारी सीजन की हर खरीदारी किसी ऐसे व्यक्ति की रोजी-रोटी में मदद करती है, जो आने वाले ग्राहकों पर निर्भर है। इससे पैसा स्थानीय अर्थव्यवस्था में सर्कुलेट होता है, जिससे छोटे कारोबार अधिक रोजगार दे सकते हैं। बेशक, ऑनलाइन शॉपिंग के अपने फायदे हैं। समय बचता है, सुविधा मिलती है और ऐसे उत्पाद भी मिलते हैं, जो स्थानीय बाजार में उपलब्ध नहीं होते। तकनीक को नकारने की जरूरत नहीं है। बस यह ध्यान रखना है कि सुविधा हमारी जिंदगी जीने का विकल्प न बन जाए। आइए, इस रोशनी के पर्व पर घरों के साथ शहर से अपने रिश्तों को भी रोशन करें। फोन एक तरफ रखकर बाहर निकलें और देखें कि गलियां कैसे आपको हैरान कर सकती हैं। परिवार साथ लेकर जाएं। ऐसे बाजार में घूमें, जहां पहले कभी नहीं गए। छोटी दुकान से कुछ खरीदें, स्थानीय व्यंजन चखें, किसी अनजान से रास्ता पूछें और दुकानदार से बातचीत करें। हो सकता है कि आप अपनी योजना से कम, लेकिन ऑनलाइन शॉपिंग कार्ट के मुकाबले कहीं ज्यादा यादें लेकर लौटें। फंडा यह है कि शहर सिर्फ सड़कों, इमारतों और बाजारों से नहीं बनता। यह वहां रहने वाले लोगों और उनके बनाए रिश्तों से बनता है। आखिरकार, शॉपिंग में हमें सबसे अच्छी चीजें अकसर वही मिलती हैं, जिन्हें तलाशने हम कभी निकले ही नहीं थे।
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