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एन. रघुरामन का कॉलम: उन पिताओं को सलाम, जिन्हें कभी रविवार की भी छुट्टी नहीं मिली!

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53 मिनट पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

‘क्या तुमने कभी मेरे पिता को स्कूल में होने वाली पैरेंट्स-टीचर्स मीटिंग (पीटीएम) में आते देखा है? वे हमेशा दफ्तर में व्यस्त रहते थे और मेरे जीवन के उन महत्वपूर्ण पड़ावों में शामिल होने की उन्हें कभी फिक्र नहीं हुई। हमेशा मां ही आती थीं…’। फिल्म ‘लक्ष्य’ में एक दृश्य है, जिसमें ऋतिक रोशन अपने बचपन के दोस्त से पिता की शिकायत कर रहे होते हैं। पिता उनके द्वारा चुने गए कॅरिअर को लेकर सख्त असहमति रखते हैं।

लेकिन आज की कहानी उस हीरो की नहीं, बल्कि उन पिता की है, जिन्हें यह तक नहीं पता कि इतनी मेहनत करके अपने बच्चों का जीवन सुरक्षित करने के लिए भी उनकी आलोचना की जा रही है। यह उन पिताओं की कहानी है, जिन्होंने शायद ही कभी अपने बच्चों से ‘आई लव यू’ कहा हो, क्योंकि वे अपने प्यार को हकीकत में साबित करने में व्यस्त थे।

यह उन पिताओं की कहानी है, जो अपने बच्चों को कभी वीकेंड में बाहर घुमाने नहीं ले जा सके- पीटीएम में जाना तो दूर की बात है। क्योंकि उनके लिए काम से एक दिन की गैरहाजिरी का मतलब था पूरे परिवार के लिए एक दिन की आमदनी का नुकसान। उनके लिए रविवार जैसी कोई चीज नहीं थी।

अगर आप सोच रहे हैं कि क्या आज भी इस दुनिया में ऐसे पिता मौजूद हैं, तो आइए, मैं आपका परिचय 73 वर्षीय बुरसी प्रधान और उनकी 62 वर्षीय पत्नी अनुसया से कराता हूं। वे ओडिशा के एक दूरदराज गांव में एक जर्जर मकान में रहते हैं। बुरसी ने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा दिहाड़ी मजदूर के रूप में बिताया। काम की तलाश में वे केरल तक गए, क्योंकि उनके लिए एक दिन काम न करने का मतलब था परिवार का एक दिन भूखा रहना।

जब खराब स्वास्थ्य ने उन्हें वापस गांव लौटने पर मजबूर कर दिया और पूरे परिवार की गुजर-बसर खेती से होने वाली आमदनी पर निर्भर हो गई, तब जाकर बुरसी को अपनी वर्षों की कड़ी मेहनत का फल मिलना शुरू हुआ। बुरसी के बड़े बेटे बिभीषण ने 2021 में कोरापुट के श्री लक्ष्मण नायक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में दाखिला लिया।

पिछले साल बेटी मोनालिसा भी उसी कॉलेज में पहुंच गई। इस साल बेटे असरिया और बेटी सुनेमी ने भी क्रमशः भवानीपटना और बलांगीर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की सीट हासिल कर ली। उनके भाई के घर में भी कुछ ऐसा ही हुआ।

बुरसी के छोटे भाई की बेटी मिनखी ने भी इस साल नीट पास किया और पुरी के श्री जगन्नाथ मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में दाखिला लिया। सात बच्चों के पिता बुरसी के लिए इनमें से कुछ भी आसानी से नहीं हुआ था। बुरसी जैसे पिताओं का सबसे बड़ा सपना बहुत सीधा-सरल होता है- वे चाहते हैं कि उनके बच्चे वैसी जिंदगी न जिएं, जो उन्होंने जी है।

मेरे बच्चो, हो सकता है कि कुछ पिताओं के पास तुम्हारे लिए अपना प्यार जताने का समय न रहा हो। जब तुम फैशनेबल कपड़े चाहते थे, तब शायद वे यह सोच रहे होते थे कि उन्हें खरीदने के लिए कुछ और रुपये कैसे कमाए जाएं। जब तुम बेहतर खाना चाहते थे, तब शायद वे सोच रहे होते थे कि एक दिन और कैसे काम किया जाए।

जब तुम चैन की नींद सो रहे थे, तब शायद वे अगले दिन के खर्चों का हिसाब लगा रहे थे। वे तुम्हें अपना समय इसलिए नहीं दे पाए, क्योंकि वे तुम्हें एक बेहतर जिंदगी देने की कोशिश में व्यस्त थे। इसीलिए जब वे तुम्हारे लिए नए कपड़े लेकर आएं, तो उनसे यह भी पूछो कि उन्होंने अपने लिए क्या खरीदा।

जब तुम उस पिज्जा का मजा ले रहे हो, जिसके लिए उन्होंने अपना क्रेडिट कार्ड स्वाइप किया है, तो इस बात पर भी ध्यान दो कि वे खुद क्या खा रहे हैं। और जब वे रात में बिस्तर पर बेचैनी से करवटें बदल रहे हों, तो जाकर उनके पैर दबा आओ।

उनसे कहो कि तुम उनके साथ हो और एक परिवार के रूप में हम इस मुश्किल दौर से भी पार निकल जाएंगे। फिर देखना, वे कितने सुकून से सोते हैं। ओडिशा के दूरदराज गांव के बुरसी की कहानी ने मुझे उन गलत समझे गए पिताओं की याद दिला दी, जो मुंबई, दिल्ली और दूसरी जगहों पर साल के 365 दिन काम करते हैं, ताकि उनके ‘घर की नैया पार हो जाए’।

फंडा यह है कि ज्यादातर घरों में पिता शायद ही कभी कहते हैं, ‘मैं तुमसे प्यार करता हूं।’ और शायद पितृत्व की यही सबसे खूबसूरत परिभाषा है कि एक व्यक्ति चुपचाप कठिन जिंदगी को स्वीकार कर ले, ताकि उसके बच्चे थोड़ी आसान जिंदगी जी सकें। मैं अनुरोध करूंगा कि ऐसे पिताओं को सलाम कीजिए।

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