एन. रघुरामन का कॉलम:  कला में डूबे रहें, ये आपकी उम्र बढ़ने की रफ्तार घटाएगा
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एन. रघुरामन का कॉलम: कला में डूबे रहें, ये आपकी उम्र बढ़ने की रफ्तार घटाएगा

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क्या आपको दादाजी-नानाजी का दौर याद है? वे हर शाम कहां जाते थे- किसी मंदिर में, स्कूल या सामुदायिक सांस्कृतिक मीटिंग में। हमारी दादी-नानी अकसर रसोई में कहती रहती थीं- ‘पता नहीं उन जगहों पर ऐसा क्या है कि दिनभर के काम से लौटने के बाद 15 मिनट भी घर नहीं रुकते।’ दूसरों के बारे में तो नहीं जानता, लेकिन हमारी चॉल में उस दौर के ज्यादातर बुजुर्ग किसी न किसी सांस्कृतिक गतिविधि में जरूर व्यस्त रहते थे। बाद में मेरे पिता भी ऐसे ही हो गए। नागपुर में ‘सरस्वती विद्यालय’ संचालित करने वाली संस्था ‘साउथ इंडियन एसोसिएशन’ में उनकी सोमवार को मीटिंग होती थी। इसी स्कूल में मैं पढ़ा था और तीन यूनिट्स में फैले उन 150 घरों के लगभग 90% बच्चे वहीं पढ़ते थे। उन घरों के ज्यादातर लोग किसी न किसी मंदिर से जुड़े थे, जिनकी मीटिंग मंगलवार या गुरुवार को होती थीं। शनिवार, रविवार को सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। जैसे, कर्नाटक म्यूजिक कॉन्सर्ट, घुमंतू मंडली का ड्रामा। कभी बच्चों का ‘अरंगेत्रम’, जिसमें वे पहली बार सार्वजनिक नृत्य प्रस्तुति देते थे या फिर दक्षिण भारत से कोई संत आकर 15 दिन या एक महीने तक रामायण, भगवान शिव, उनके पुत्र भगवान कार्तिकेय या दुर्गा मां जैसे विषयों पर धार्मिक प्रवचन देते थे। अब इस विषय से अलग एक बात बताता हूं। मेरे परिवार के और जहां मैंने बचपन बिताया, उस इलाके के ज्यादातर पुरुष- जो खुद को सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय रखते थे- 90 साल से ज्यादा या कम से कम 80 के पार तो जरूर जिए। जबकि उनकी पत्नियां पहले गुजर गईं। तब हममें से किसी को नहीं पता था कि इसका कला-संस्कृति में समय बिताने से भी कोई संबंध हो सकता है। लेकिन मुझे यह किस्सा इस बुधवार को याद आया, जब मैंने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की एक रिसर्च पढ़ी कि हफ्ते में एक बार सांस्कृतिक गतिविधि में शामिल होने से उम्र बढ़ने की रफ्तार कम से कम एक साल तक धीमी हो सकती है। रिसर्च कहती है कि आज के दौर की सांस्कृतिक गतिविधियों में पढ़ना, म्यूजिक कॉन्सर्ट सुनना, आर्ट गैलरी और थिएटर जाना, पेंटिंग करना, वाद्ययंत्र बजाना, आर्ट डॉक्यूमेंट्री देखना और म्यूजियम या प्रदर्शनियों में जाना शामिल है। दरअसल, अपने वयस्क जीवन से ज्यादा सांस्कृतिक कार्यक्रम मैंने बचपन में अपने ग्रैंडपैरेंट्स के साथ देखे थे। मेरे नाना सुबह-शाम मंदिर जाना कभी नहीं छोड़ते थे। उन्हीं से मुझे संगीत कार्यक्रम और प्रवचन सुनने की आदत लगी। यहां तक कि आज भी मैं पवई फाइन आर्ट्स सोसाइटी और षणमुखानंद सभा जैसी कई ‘सभाओं’ का आजीवन सदस्य हूं। लाइव परफॉर्मेंस देखना मेरे लिए बेहद आनंददायक होता है। चूंकि मैं खुद भी परफॉर्मर हूं, इसलिए कलाकारों की बॉडी लैंग्वेज, शब्द-चयन और हास्यबोध से सीखता हूं। लाइव परफॉर्मेंस मुझे सिनेमा से ज्यादा ​सिखाती है। हाल ही में 12 मई को मेरी बेटी न्यूयॉर्क के म्यूजियम ऑफ मॉडर्न आर्ट गई थी और पूरे दिन में वह पांच मंजिला इमारत के तीन से ज्यादा फ्लोर नहीं देख पाई। मुंबई में बैठे-बैठे उसने मुझे वीडियो कॉल पर वे फ्लोर दिखाए। नतीजतन, आज मैं मॉडर्न आर्ट पर पांच मिनट तो बात कर ही सकता हूं। ऐसे जुड़ाव मुझे अपनी ‘सिसिफस’ जैसी अंतहीन टु-डु लिस्ट के बारे में सोचते रहने से बचाते हैं। फिर चाहे यह स्टेडियम में फुटबॉल या क्रिकेट मैच देखना ही क्यों न हो, मुझे बाहर जाकर ऐसी चीज से जुड़ना पसंद है, जो मुझसे बहुत बड़ी हो और जिसे मैं अकेला नहीं कर सकता। किसी दूसरी दुनिया में झांकना और अपनी संभावनाओं को समझना मुझे रोमांचित करता है। फंडा यह है कि आधुनिक रिसर्च भले यह दावा करती हो कि सांस्कृतिक गतिविधियों में शामिल होने से जिंदगी के कुछ साल बढ़ जाते हैं, लेकिन शायद हमारे बुजुर्ग शायद पहले से यह जानते थे कि निश्चित ही इससे जिंदगी ज्यादा अर्थपूर्ण बन जाती है।



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