एन. रघुरामन का कॉलम:  क्या पड़ोसी की अमीर लाइफस्टाइल से खुद को गरीब महसूस करते हैं
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एन. रघुरामन का कॉलम: क्या पड़ोसी की अमीर लाइफस्टाइल से खुद को गरीब महसूस करते हैं

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एक मॉर्निंग वॉकर ने कहा, ‘मेरे पड़ोसी ने अक्षय तृतीया पर बिना लोन के ऑडी खरीदी है।’ बात जब तक पूरी होती, दूसरे ने कहा कि ‘क्या कह रहे हो? मेरे पड़ोसी ने भी कल मर्सिडीज ली है। क्या संयोग है।’ सोमवार को पवई प्रोमेनेड पर मॉर्निंग वॉक के दौरान बातचीत ऐसे शुरू हुई। सच कहूं तो मैं हैरान नहीं था। पिछली रात ही मुझे अंदाजा हो गया था कि सुबह बातचीत किस बारे में होगी। खबर फैल चुकी थी कि मुंबई में वीकेंड पर गाड़ियों की खरीद में तेजी आई है। नई कारों के रजिस्ट्रेशन में 8% और टू-व्हीलर्स के रजिस्ट्रेशन में 37% की बढ़ोतरी हुई थी, क्योंकि खरीदार अक्षय तृतीया पर डिलीवरी लेने के इंतजार में थे। सुकून देने वाली सुबह की धूप, होड़ के सामने फीकी दिख रही थी। मैं हल्की मुस्कान के साथ बातचीत सुन रहा था। एक जिज्ञासु वॉकर ने अपने पड़ोसी के बारे में बात कर रहे व्यक्ति से पूछा, ‘आपने पहले कभी नहीं बताया कि आपका पड़ोसी इतना अमीर है?’ जवाब आया कि ‘तीन महीने पहले उनके पिता का निधन हो गया था। उनके पास अच्छा-खासा बैंक बैलेंस था।’ अब उनका लहजा थोड़ा बदल गया था, जिसमें गर्व भी था और सफाई भी। फिर उस व्यक्ति ने मुझे मुस्कराते देखकर पूछा, ‘तुम क्यों मुस्करा रहे हो?’ उनकी आवाज में थोड़ी चिढ़ दिख रही थी। मैंने शांत होकर कहा कि ‘मुझे लगता है कि आगामी दिनों में आपके अंदर कुछ बदलेगा।’ वे इसे हल्के में लेकर बोले, ‘मैं 60 साल से ऊपर का हूं, 30 का नहीं, जो पड़ोसी की सफलता से असुरक्षित महसूस करूं।’ बहस के बजाय मैंने नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर, यूनिवर्सिटी ऑफ अल्बर्टा और फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ फिलाडेल्फिया के रिसर्चर्स द्वारा की गई एक स्टडी का जिक्र किया। 2004 से 2014 के बीच हजारों घरों पर यह स्टडी की गई, ताकि समझा जा सके कि जब किसी के पास अचानक से पैसा आता है- जैसे, कोई लॉटरी जीतना या महंगी चीज खरीदना- तो पड़ोस में क्या होता है? वह विस्तार से सुनते, उससे पहले मैंने उनसे एक प्रश्न पूछा, ‘क्या आपने वॉक पर आने से पहले अपनी कार को अलग नजरिए से देखा था?’ वह ठिठक गए। न हां कर पाए, न इनकार। मैं बोला, ‘इसीलिए मैं मुस्करा रहा था।’ रिसर्च के नतीजे काफी दिलचस्प थे। पड़ोस में जब कोई लग्जरी पर अधिक खर्चा करता है तो इससे सामाजिक मापदंड बदलते हैं। लोग इसमें इंगेज होने लगते हैं। इसे अर्थशास्त्री ‘कंस्पिक्युअस कंजम्पशन’ कहते हैं- यानी उपयोगिता के लिए नहीं, हैसियत दिखाने के लिए खर्च करना। दिलचस्प यह है कि उनकी आर्थिक हकीकत नहीं बदलती, लेकिन उसे देखने का नजरिया बदल जाता है। इसी बात को 2010 में यूनिवर्सिटी ऑफ वारविक की एक और स्टडी ने भी साबित किया। 80 हजार से ज्यादा वयस्कों पर हुए सर्वे में पाया गया कि लोगों की जीवन-संतुष्टि अपनी कमाई पर कम और दूसरों की कमाई से तुलना पर ज्यादा निर्भर करती है। सरलता से कहें तो लोग अपनी सम्पत्ति से नहीं, बल्कि दूसरों से तुलना करके खुद को अमीर या गरीब मानते हैं। यहीं से समस्या शुरू होती है। एक अमीर पड़ोसी से आपको कभी आर्थिक दबाव में नहीं आना चाहिए। लेकिन अकसर ऐसा ही होता है, क्योंकि बहुत से लोग अपनी सफलता को अपनी सम्पत्ति से नहीं, बल्कि इससे मापते हैं कि दूसरों की तुलना में यह कितनी है। यही तुलना संतोष खत्म कर देती है। सच असहज है, लेकिन महत्वपूर्ण है। पैसे के साथ स्वस्थ रिश्ता तुलना पर नहीं, भीतर से बनता है। अपने पैसे को लेकर सुरक्षित महसूस करने वाले लोग अपनी सफलता खुद तय करते हैं। चाहे वह व्यक्तिगत लक्ष्य हासिल करना या वित्तीय अनुशासन बनाए रखना हो, या फिर यह समझना हो कि वे कहां से कहां तक पहुंचे हैं। हमारी वॉक खत्म हुई तो बातचीत कारों और पड़ोसियों से दूसरे विषयों पर चली गई। लेकिन एक सवाल रह गया : हम अपना जीवन जी रहे हैं, या बस उसे माप रहे हैं? फंडा यह है कि जब पड़ोसी की सफलता पर आप खुद को गरीब समझने लगें तो समस्या सम्पत्ति नहीं, बल्कि आपका नजरिया है।



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