एन. रघुरामन का कॉलम:  ग्रॉसरी शॉपिंग से सर्जरी तक कन्फ्यूजन का सबसे बेहतर हल है ‘चेकलिस्ट’
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एन. रघुरामन का कॉलम: ग्रॉसरी शॉपिंग से सर्जरी तक कन्फ्यूजन का सबसे बेहतर हल है ‘चेकलिस्ट’

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7 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

जब आप अगला पैराग्राफ पढ़ना शुरू करेंगे तो यकीन मानिए उसे दोबारा पढ़ेंगे, क्योंकि वह काफी कन्फ्यूजिंग है। और अगर आप पूरा लेख पढ़ेंगे तो समझ जाएंगे कि जिंदगी में गलतियां क्यों होती हैं। अधिकतर गलतियां इसलिए नहीं होतीं कि हमें जानकारी नहीं होती, बल्कि हम अपनी जानकारी को सही से लागू नहीं कर पाते। तो फिर हल क्या है? एक चेकलिस्ट बनाइए। अब आप कन्फ्यूजन के लिए तैयार हो जाइए, और आगे इसे दूर करने का तरीका भी है।

पिछले महीने एक-दूसरे से अनजान राधिका देवी और राधिका सिंह को एक ही समय पर वाराणसी के बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) के ट्रॉमा सेंटर में अलग-अलग भर्ती किया गया। राधिका देवी 71 साल की और राधिका सिंह 82 वर्ष की थीं। राधिका देवी न्यूरो डिपार्टमेंट में बेड नंबर 29 पर थीं। राधिका सिंह ऑर्थोपेडिक डिपार्टमेंट में बेड नंबर 17 पर थीं। राधिका देवी की स्पाइनल ट्यूमर सर्जरी, जबकि राधिका सिंह का हिप रिप्लेसमेंट होना था। दोनों की सर्जरी का समय एक ही था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 7 मार्च को सिंह की जगह देवी को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया। एनेस्थीसिया देने के बाद सर्जिकल टीम ने देवी का ऑपरेशन शुरू कर दिया। जब सीनियर रेजिडेंट को ऑपरेशन की जगह पर अपेक्षित स्थिति नहीं दिखी तो टीम ने सीनियर डॉक्टर को अलर्ट किया। इसी बीच, नर्सिंग स्टाफ ने बताया कि थिएटर में गलत मरीज आ गया है।

पूरी प्रक्रिया रोकी गई और परिवार को बिना कुछ बताए ही देवी को वापस भेज दिया गया। बाद में 18 मार्च को उनकी स्पाइनल ट्यूमर सर्जरी हुई और कुछ जटिलताएं होने के कारण 28 मार्च को उनकी मृत्यु हो गई। यह चूक तब सामने आई, जब उनके पोते मृत्युंजय पाल ने बीएचयू में इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के डायरेक्टर से शिकायत की।

चूंकि हम में से ज्यादातर लोग मेडिकल प्रोफेशनल नहीं हैं, तो आइए आपको ग्रॉसरी स्टोर ले चलता हूं। सोचिए कि आपके परिवार ने शनिवार को दादाजी का 90वां बर्थडे मनाने का फैसला किया। आपकी पत्नी केक बनाना चाहती हैं। उन्होंने आपको किराने की लिस्ट दी, जो सामान आपको शुक्रवार शाम ऑफिस से लौटते वक्त लाना था। जब आप शेल्फ से सामान उठा रहे होते हैं तो बॉस का फोन आता है और वह चिल्लाते हैं कि आपने काम पूरा नहीं किया। सोने से पहले इसे पूरा कर देना। गुस्से और कन्फ्यूजन में आप मैदा भूल जाते हैं। नतीजतन, आपकी पत्नी केक नहीं बना पाएंगी।

दोनों ही मामलों में जानकारी तो थी, लेकिन उसका उपयोग गलत हो गया। तो क्या करें? मुझे करीब दो दशक पहले पढ़ी डॉ. अतुल गवांडे की किताब ‘द चेकलिस्ट मैनिफेस्टो’ याद है, जिसमें गवांडे ऐसा समाधान बताते हैं, जिसे अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन ने भी अपनाया है। पेशे से सर्जन रहे लेखक लंबे व्यक्तिगत अनुभव के जरिए चेकलिस्ट कॉन्सेप्ट समझाते हैं। उन्होंने न सिर्फ अलग-अलग क्षेत्रों में चेकलिस्ट के असर पर रिसर्च की, बल्कि अस्पतालों में इसे लागू भी किया।

वे कहते हैं कि कोई असामान्य घटना हो जाए तो कोई व्यक्ति वो काम भी भूल सकता है, जो वह सामान्यत: करता है। दूसरी बात, हम कम महत्वपूर्ण स्टेप्स छोड़ देते हैं, क्योंकि पिछली बार छोड़ा तो कुछ नहीं हुआ था। कोई कह सकता है कि ‘यह कभी समस्या नहीं रही’, लेकिन क्या गारंटी है कि अगली बार नहीं होगी?

गवांडे कहते हैं कि हम चेकलिस्ट जैसी साधारण चीज के जरिए ऐसी विफलताओं से बच सकते हैं। यह हमें जरूरी स्टेप्स याद दिलाती है और उन्हें स्पष्टत: सामने रखती है। यह न सिर्फ वेरिफिकेशन संभव बनाती है, बल्कि बेहतर प्रदर्शन के लिए अनुशासन का भाव भी पैदा करती है।

फंडा यह है कि अगली बार जब आप अपने जीवन या वर्कप्लेस पर किसी बड़े काम पर ध्यान दे रहें हों तो चेकलिस्ट जैसी छोटी चीज बनाना और इसे जांचते हुए टिक करना जरूर याद ​रखिएगा।

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