एन. रघुरामन का कॉलम:  ‘चुपचाप भुगतने दो’ की कला में आलोचना झेलने का तरीका छिपा है!
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एन. रघुरामन का कॉलम: ‘चुपचाप भुगतने दो’ की कला में आलोचना झेलने का तरीका छिपा है!

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2 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

सैकड़ों सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से भरी दुनिया में किसी को भी अपनी राय व्यक्त करने के लिए दरवाजे हमेशा खुले हुए हैं, लेकिन हर विषय पर अपनी विशेष टिप्पणी देना तो जैसे कई लोगों का शगल बनता जा रहा है। चाहे उन्हें उस क्षेत्र का ज्ञान हो या न हो। वे हर चीज पर टीका-टिप्पणी करते हैं और किसी भी बात को तिल का ताड़ बना सकते हैं। अगर आप भी उन लोगों में से हैं जो अपने अच्छे काम के बावजूद भी लोगों की शिकायतों की बौछार से परेशान हो जाते हैं, तो यह कहानी आपके लिए है।

जयपुर में एक महिला हैं, जो एक पेइंग गेस्ट हाउस चलाती हैं। उनका एक पुश्तैनी घर है, जिसमें 10-12 बड़े कमरे हैं। उन्होंने हर कमरे में 3 बिस्तर लगा रखे हैं। उनके पेइंग गेस्ट हाउस में भोजन भी मिलता है। उन्हें खाना खिलाने का बहुत शौक है। वे बड़े मन से खाना बनाती और खिलाती हैं। उनके यहां इतना शानदार भोजन मिलता है कि कोई बढ़िया से बढ़िया शेफ भी वैसा नहीं बना सकता। उनके पेइंग गेस्ट हाउस में ज़्यादातर नौकरी करने वाले लोग और छात्र रहते हैं। सुबह का नाश्ता और रात का भोजन तो सभी लोग करते ही हैं। और जिसे ज़रूरत होती है, वे दोपहर का भोजन पैक करके भी देती हैं।

लेकिन उनके यहां एक बड़ा अजीब नियम है। हर महीने में सिर्फ 28 दिन ही भोजन बनता है। बाकी 2 या 3 दिन सबको होटल में खाना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि आप पेइंग गेस्ट हाउस की रसोई में खुद कुछ बना लें। रसोई उन 2-3 दिनों के लिए पूरी तरह से बंद रहती है। हर महीने के आखिरी तीन दिन मेस बंद रहता है। सभी को होटल में खाना पड़ता है, और चाय भी बाहर जाकर पीनी होती है।जब किसी ने पूछा कि यह क्या अजीब नियम है? आपकी रसोई केवल 28 दिन ही क्यों चलती है?

वे बोलीं, “शुरू में यह नियम नहीं था। मैं इसी तरह, इतने ही प्यार से खाना बनाती और खिलाती थी। पर उनकी शिकायतें कभी खत्म ही नहीं होती थीं। कभी यह कमी है, कभी वह कमी है- हमेशा असंतुष्ट और आलोचना करते रहते थे। इसलिए तंग आकर मैंने यह 28 दिन वाला नियम बना दिया। 28 दिन प्यार से खिलाओ और बाकी 2-3 दिन बोल दो कि जाओ, बाहर खाओ। उन 3 दिनों में, उन्हें नानी याद आ जाती है। उन्हें आटे-दाल का भाव पता चल जाता है। उन्हें पता चल जाता है कि बाहर कितना महंगा और कितना घटिया खाना मिलता है। दो घूंट चाय भी 15-20 रुपये की मिलती है। उन्हें मेरी कीमत ही इन 3 दिनों में पता चलती है। इसलिए बाकी 28 दिन वे बहुत कायदे में रहते हैं।

”यह वाकिया मुझे तब आया, जब मुझे शनिवार की सुबह दैनिक भास्कर के पाठक 70 वर्षीय शारदा और उनके 75 वर्षीय पति सीताराम अग्रवाल का ईमेल मिला। वे रायपुर के तेलीबांधा से हैं। उन्होंने लिखा कि कैसे कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी के समिति सदस्यों की, वहां के रहवासी बिना वजह आलोचना करते हैं। और रहवासी, समिति सदस्यों से ऐसे पेश आते हैं, मानो वे सैलरी पर रखे हुए कोई कर्मचारी हों, जबकि वे लोग तो स्वेच्छा से अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

उन्होंने दुखी होकर बताया कि अमूमन सभी हाउसिंग सोसायटी के यही हाल हैं, जहां अगर कॉलेनी में किसी भी सुविधा में कमी या उसका अभाव दिखता है, तो रहवासी आपे से बाहर हो जाते हैं। सीताराम जी ने मेरे साथ फोन पर बातचीत में बताया कि इससे असंतोष बढ़ता है और अच्छे दिल से काम करने वाले वॉलेंटियर भी सामाजिक कामों से खुद को दूर कर लेते हैं।

फंडा यह है कि अगर आप चाहते हैं कि ग्राहक आपकी निष्ठा, प्रतिबद्धता और गुणवत्ता का मूल्य समझें, तो उनकी बात पर कोई प्रतिक्रिया न दें, बस अपनी अनुपस्थिति से उन्हें आपकी प्रतिबद्धता का एहसास कराएं। जब वे चुपचाप भुगतेंगे और गुणवत्तापूर्ण सेवाओं की कमी का अनुभव करेंगे, तभी वे आपका सम्मान करेंगे।

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