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फोन स्क्रीन की हल्की रोशनी में उन्होंने टाइप किया, ‘मैं भी जीने से तंग आ गया हूं। क्या तुम मुझे अपने साथ ले जाओगे, मुझे डर लग रहा है।’ वह एक ही सेकंड पहले आए मैसेज का रिप्लाई दे रहे थे, जिसमें लिखा था कि ‘मैं पहले जा रहा हूं।’ अपने साथ ले जाने की गुहार लगाने के साथ ही वह लोकेशन की पुष्टि करने के लिए बार-बार उससे फोटो भेजने के लिए भी कह रहे थे, ताकि समय से उसके पास पहुंच सकें। हममें से ज्यादातर को यह आत्महत्या करने जा रहे दो किशोरों के बीच की बातचीत लगेगी। चंद लोग ही समझ पाएंगे कि इनमें से एक वो पिता हैं, जिन्होंने ऐसी ही बेवकूफी के चलते अपने बेटे को खो दिया। अब वे अपने मृतक बेटे के फोन से दूसरे बच्चों से बात कर रहे हैं, ताकि उसे आत्महत्या से रोक सकें। जैसे ही लोकेशन भेजी गई, उन्होंने दोस्तों को पुलिस को अलर्ट करने को कहा। पुलिस अधिकारियों के मौके पर पहुंचने तक वो पिता बच्चे से चैट करते रहे, जैसे रास्ता ढूंढ रहे हों। यह एक ग्रुप चैट है (एक जिम्मेदार अखबार होने के नाते हम साइट का नाम नहीं बता रहे हैं)। चीन के हेनान प्रांत में रहने वाले 45 साल के शू ने मई 2020 में अपने 17 साल के बेटे को खो दिया था, जिसने उनके ही अपार्टमेंट से कूदकर जान दे दी। अब शू ज्यादा से ज्यादा बच्चों की जान बचाने की ठान चुके हैं। बेटे की मौत के बाद शू ने उसका मोबाइल फोन देखा तो किशोरों के जीवन के कई पहलू सामने आए। उसने किसी आवेग में आत्महत्या नहीं की थी। शू को पता चला कि उनका बेटा लंबे समय से अवसाद, निराशा और सेल्फ-डिनायल के दुष्चक्र में फंसा था। उसकी गर्लफ्रेंड पढ़ाई में अच्छी थी और उससे बेहतर ग्रेड्स लाती थी। बेटा कई सारे ऑनलाइन चैट ग्रुप में जुड़ा था और उनमें से एक ‘XXXX’ था, जहां किशोर शिक्षक, माता-पिता, स्कूल और ग्रेड्स को लेकर बातें करते थे। धीरे-धीरे वे छोटे-छोटे ग्रुप्स में बंट गए। सकारात्मकता खत्म हो गई और उसकी जगह शिकायतों ने ले ली, क्योंकि एक-दूसरे के प्रति नकारात्मक भावनाएं बढ़ती रहीं। अंतत: ‘सुसाइड पैक्ट चैट’ नाम से एक अंतिम ग्रुप बना। शू देखकर सन्न रह गए कि किशोरों के लिए जान देना कितना आसान हो गया है। शू पेशे से होम रेनोवेशन वर्कर हैं और कभी-कभी झेंगझोउ रेड क्रॉस वाटर रेस्क्यू टीम के वाॅलंटियर भी रहते हैं। पानी में डूबने वालों को निकालने का अनुभव रखने वाले शू ने बेटे की मौत के बाद मोबाइल चैट ग्रुप्स की इस अंधेरी दुनिया में और ‘डीप डाइविंग’ करने का फैसला किया। इन ग्रुप्स में भाषा कोड जैसी होती थी। ‘बर्निंग चारकोल’ को ‘बार्बेक्यू’ कहते थे। नदी में कूदने को ‘डाइविंग’ और इमारत से छलांग लगाने को ‘क्लबिंग’ कहते थे। यहां ये बताना जरूरी है कि जिस रात शू मैसेज टाइप कर रहे थे, जिसके बारे में लेख की शुरुआत में बताया गया है- पुलिस ने 13 से 14 साल उम्र के पांच बच्चों को सुरक्षित बचा लिया। 10 से 14 साल की उम्र के बच्चों में आत्महत्या मौत का तीसरा बड़ा कारण है। इन वर्षों में बड़े बदलाव आते हैं, जिनमें शरीर, विचार, भावनाओं के बदलाव शामिल हैं। तनाव, उलझन, डर और संदेह की भावनाएं किशोरों की समस्या सुलझाने और फैसला करने की क्षमता प्रभावित कर सकती हैं। उन पर सफल होने का दबाव भी होता है। जब शू अपना हरसंभव प्रयास कर रहे हैं, तो जब बच्चे घर में हों तो हमें भी जुड़ाव की भावना बढ़ाते हुए सुरक्षित माहौल बनाना चाहिए। समस्याओं से जूझने और उन्हें सुलझाने की क्षमता विकसित करने में बच्चों की मदद करें, ताकि भविष्य के जोखिमों को टाला जा सके। फंडा यह है कि यदि हम अपने किशोरों से ऑनलाइन की जगह ऑफलाइन बातचीत करें तो जिंदगी ज्यादा सरल और खुशहाल होगी। यदि वे ज्यादा ऑनलाइन रहते हैं तो यह देखने के बजाय कि वे क्या देख रहे हैं, इस पर नजर रखें कि वे किसे और क्या लिख रहे हैं। यह इतना ही सरल भी है।
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