पवन के. वर्मा का कॉलम:  क्या इस बार बजट में सुधार के जोखिम उठाए जाएंगे?
टिपण्णी

पवन के. वर्मा का कॉलम: क्या इस बार बजट में सुधार के जोखिम उठाए जाएंगे?

Spread the love




वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लगातार आठ वर्षों तक बजट पेश करने के कारण बधाई की पात्र हैं। हमारा राजकोषीय घाटा नियंत्रण में है और महंगाई भी काफी हद तक काबू में है। समृद्ध विदेशी मुद्रा भंडार है और 6% से अधिक की आर्थिक वृद्धि दर के साथ हम दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में हैं। लेकिन बजट की पूर्व संध्या पर उनसे मेरा सवाल ये है कि इस माहौल में क्या वे ऐसा जोखिम उठाना चाहेंगी, जो भारत के आर्थिक स्तर को और ऊंचा ले जा सकें? हाल ही एक कॉर्पोरेट हस्ती ने मुझसे कहा कि सरकार व्यवसायियों से कहती है वे जोखिम लेने की क्षमता बढ़ाएं। भारतीय जन्मजात उद्यमी होते हैं और जोखिम लेकर ही आगे बढ़ते हैं। पर क्या ऐसे माहौल में रिस्क ली जानी चाहिए, जिसमें विफलता को धोखाधड़ी मान लिया जाता हो? जिसमें यदि किसी के बारे में यह धारणा बन जाए कि वह सरकारी लाइन पर नहीं चल रहा तो उसके जांच एजेंसियों के शिकार बनने का खतरा मंडराने लगे? निर्मला जी, क्या आप निवेशकों का भरोसा बढ़ाने के लिए उनके मन में ऐसे अंदेशे रोपने वाले सिस्टम को बदलने का जोखिम ले सकती हैं? सरकार के पास दो कार्यकालों में पूर्ण बहुमत रहा और आज भी स्थिर बहुमत है। आर्थिक सुधारों को तेज और ईज ऑफ डुइंग बिजनेस को बेहतर करने का यही सही समय है, क्योंकि आज भी हम इस मामले में विश्व बैंक की सूची में 63वें स्थान पर हैं। कुछ सुधार जरूर हुए हैं, लेकिन उनसे ज्यादा ठंडे बस्ते में हैं। मसलन, भूमि और श्रम कानून। कई ऐसे अप्रासंगिक नियम हैं, जो भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं। क्या सरकार इन सुधारों को तेजी से आगे बढ़ाने का जोखिम उठा सकती है? इसी तरह, क्या सरकार ऐसी योजनाओं पर अपनी निभर्रता कम करने का राजनीतिक जोखिम उठाएगी, जिनमें मुफ्त की चीजें, रियायतें या आर्थिक सहायता ही हों- उत्पादकता या रोजगार से कोई लेना-देना नहीं हो। हां, भारत जैसे देश में सामाजिक सुरक्षा एक हद तक मानवीय है और आर्थिक तौर पर तर्कसंगत भी। लेकिन असली चुनौती इन सहायताओं को ऐसा जरिया बनाने में है, जो लोगों को सुरक्षित रोजगार या उद्यमिता की ओर बढ़ा सकें। निर्मला जी, क्या सरकार ऐसे सुधारों का जोखिम उठाने के लिए तैयार है? फिर, ये भी बताएं कि आज जब एआई और ऑटोमेशन नए अवसर पैदा करने के साथ ही श्रम को विस्थापित भी कर रहा है तो बेरोजगारी से निपटने के लिए आपका क्या प्रस्ताव है? मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स और सेवा क्षेत्र में भी रोजमर्रा के काम मशीनें कर रही हैं। यहां असली मुद्दा कौशल और अवसरों में असंतुलन का है। जिस किसान के पास दशकों तक सिर्फ धान रोपने का अनुभव हो, वो बिना री-स्किलिंग के सहसा एआई इको-सिस्टम में रोजगार पाने लायक नहीं बन सकता। भारत की युवा आबादी भी तभी जनसांख्यिकीय लाभ दे सकेगी, जब शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण को नए सिरे से गढ़ा जाए। भारत की जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र का योगदान लंबे समय से 15-17% के आसपास ही अटका है। इसका कारण लॉजिस्टिक्स बाधाएं, कम्प्लायंस लागतें और असंगत नीतियों जैसे संरचनात्मक मुद्दे हैं। निर्मला जी, एआई के दौर में भी क्या सरकार बेरोजगारी घटाने के लिए श्रम-प्रधान उद्योगों और कौशल विकास को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहित करने का जोखिम उठा सकती है? भारतीय मध्यम वर्ग सिर्फ अपनी आय को लेकर ही नहीं, स्वास्थ्य खतरों, शिक्षा खर्च, रिटायरमेंट की असुरक्षा, नौकरी की अनिश्चितता, मकानों की महंगाई, चाइल्डकेयर और एजुकेशन लोन सुधारों को लेकर भी चिंतित है। एक सुरक्षित मध्यम वर्ग ही खर्च और निवेश करता है और इसी से बाजार की मांग और मानव-पूंजी का निर्माण होता है। क्या सरकार मामूली कर-छूटों की दिखावटी राजनीति से आगे बढ़कर मध्यम वर्ग के लिए अधिक ठोस कदम उठाने का जोखिम ले सकती है? देश का लगभग आधा कार्यबल अकेले कृषि क्षेत्र में कार्यरत है, लेकिन जीडीपी में इसका योगदान पांचवें हिस्से से भी कम है। कृषि उत्पादकता में आए इस ठहराव से उबरने के लिए इनोवेशंस की नई लहर जरूरी है। क्या बजट में छिटपुट घोषणाओं के बजाय दूसरी हरित क्रांति की ठोस योजना लाने का जोखिम उठाया जा सकता है? भारत में अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन हमारे ही यहां अत्यंत गरीब लोग भी हैं। निर्मला जी, क्या इस बार आप अपने बजट-विजन में महज आंकड़ों का संतुलन साधने के बजाय 1991 के ऐतिहासिक आर्थिक उदारीकरण जैसे बड़े नीतिगत बदलाव लाने का जोखिम उठा सकेंगी? अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन हमारे यहां अत्यंत गरीब लोग भी हैं। क्या इस बार आंकड़ों का संतुलन साधने के बजाय 1991 के आर्थिक उदारीकरण जैसे बड़े नीतिगत बदलाव लाने का जोखिम उठाया जाएगा?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *