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एन. रघुरामन का कॉलम: डिजाइनर फूड का काम किसी के भी मुंह में कुछ महसूस कराना है

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7 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

हाल ही में मुंबई के पास करजत में अपनी दोस्त ममता शर्मा के फार्म हाउस की यात्रा के दौरान मैंने देखा कि उनका कुक स्टाइलिश तरीके से खाना बना रहा था। उसने धोया हुआ पालक का पत्ता उठाकर मुझे व दूसरे मेहमानों को दिखाया कि वह उसे बेसन के घोल में डुबोने से पहले कितनी सावधानी से साफ करता है।

फिर उसने उसे खौलते तेल की कड़ाही में बड़े करीने से उतारा। वह सुनहरा पीला होने लगा, लेकिन उसका थोड़ा-सा हरा हिस्सा अब भी दिख रहा था- मानो किसी महिला के स्लीवलेस ब्लाउज से उसकी पतली बांहें दिख रही हों।

जैसे ही पत्ता फ्राई हुआ, कुक उसे सजाने लगा। इस पर एक छोटा चम्मच दही डालते हुए वह एक दूसरी महिला गेस्ट से बोला कि ‘मैडम जी, यह आपके मुंह में आइसक्रीम की तरह पिघल जाएगा।’ फिर उसने उस पर गाढ़ी-सी हरी और मीठी चटनी रंगोली की तरह सजाई।

इसके बाद अनार के दाने ऐसे डाले, जैसे पत्ते को लाल ज्वेलरी पहना रहा हो। सुनहरा-पीला घोल, जिसमें से थोड़ा हरा हिस्सा भी दिख रहा था, उस पर सफेद दही और फिर हरे-भूरे रंग की चटनी- इसे देखकर मेरा मुंह खुला ही रह गया।

वह सजी-धजी फ्राइड-लीफ को पेपर प्लेट पर रखता, उससे पहले ही हमारे मुंह में पानी आने लगा। और जैसे ही आप पूरा पत्ता मुंह में रखो, कुछ होने लगता है। हमने आंखें बंद कर लीं और बस उस पल का आनंद लेने लगे। वहां खड़े-खड़े हमें पता ही नहीं चला कि हमने कितनी फ्राइड पालक लीव्स खा लीं।

हमारी मेंटल कैलकुलेशन सरल थी- यह पालक ही तो है, जिस पर कुछ टेस्टी लिक्विड्स डाले गए हैं। लेकिन ठीक यही डिजाइनर फूड का मैजिक है। बात अब सिर्फ यह नहीं कि आपके मुंह में क्या जा रहा है, बल्कि यह है कि आपके मुंह के भीतर क्या हो रहा है।

अभी गणेश पंडालों में या नवरात्र में गरबा ग्राउंड जाने पर हमारा बाहर खाना बढ़ जाएगा। हम ऐसे खाने की ओर आकर्षित होंगे, जो तोड़ने, खींचने के लिए डिजाइन हो या ऊजी दिखे। ऐसे फूड इसलिए ध्यान खींच रहे हैं, क्योंकि टेक्सचर सिर्फ स्वाद के जरिए नहीं, बल्कि देखने में भी खाने के मजे का एहसास करा सकता है।

तो नए इंडस्ट्री ट्रेंड में आपका स्वागत है, जहां खाने में टेक्सचर को क्रंची और गूई बनाया जा रहा है। बहुत से लोगों के लिए अब बड़ा आकर्षण यह बन गया है कि खाना मुंह के अंदर कैसा महसूस कराता है। ज्यादा क्रिस्पी स्नैक, ज्यादा झाग वाली कॉफी, ज्यादा नट्स वाली आइसक्रीम और ज्यादा जूसी कैंडीज।

टेक्सचर अब कॉम्प्लीमेंट्री फीचर से फूड क्वालिटी बताने वाला पहलू बन गया है। समोसे के टूटने से लेकर पानीपूरी के फूटने तक, कुनाला के चटकने से लेकर कुकी से स्टफिंग के रिसने तक और आइसक्रीम में क्रंच से क्रीम तक का स्वाद- ये सब हमें ज्यादा खाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

टेक्सचर खाने का इतना अभिन्न हिस्सा है कि जब लोगों से पूछा जाता है कि खाने का स्वाद कैसा है तो वे अकसर बताते हैं कि वह कैसा महसूस होता है। मेरी तरह मेहमानों के वो रिएक्शन याद कीजिए, जब मैंने ममता से कहा कि ‘वाह, पत्ता क्रिस्पियर और कलरफुल था।’ तीन साल पहले इस्तांबुल की यात्रा में मैंने स्ट्रेची आइसक्रीम चखी और आज भी मुझे उसके स्वाद से ज्यादा यह याद है कि जब मैंने उसे होंठ और दांतों से खींचा तो कैसा लगा था।

तब से टेक्सचर में दिलचस्पी काफी बढ़ गई है। यहां तक कि ऐसे साधारण-से क्रोइसां में भी, जिसमें इतना बटर भरा जाता है कि वह बाहर बह निकले। दुबई में चॉकलेट एंड साउंड जैसे फेस्टिवल होते हैं, जहां टेक्सचर का उस व्यक्ति को दिखाई और सुनाई देना जरूरी है, जो आपको खाते हुए देख रहा है।

फंडा यह है कि ‘ATATA’ फॉर्मूला इस्तेमाल करने वाले वेंडर्स हमें आकर्षित कर रहे हैं। इसमें A- अट्रैक्शन, T- टेक्सचर, A- अरोमा, T- टेस्ट और A का मतलब है- आफ्टर टेस्ट, यानी वह याद जो आप घर वापस लेकर जाते हैं।

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