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पिछले हफ्ते मेरे एक दोस्त ने वीडियो कॉल किया तो लग रहा था जैसे वह हरी-भरी पहाड़ियों वाली किसी घाटी में खड़ा हो। लेकिन वह एक माेनेस्ट्री की कक्षा में था। छात्र आंखें मूंदे फर्श पर पालथी मारकर बैठे थे। दूर कहीं घंटियां बज रही थीं, कमरे में सन्नाटा था और एक बौद्ध भिक्षु मेडिटेशन के साथ दिन की पहली कक्षा शुरू कर रहे थे। तिब्बती में बोलते हुए वह हर कुछ वाक्यों के बाद रुकते, ताकि अनुवादक उनकी बात अंग्रेजी में समझा सके। उनके मेडिटेशन समाप्त करने के बाद एक कनाडाई एंथ्रोपोलॉजिस्ट ने इतिहास की कक्षा शुरू की। मेरे दोस्त ने कक्षा से बाहर आकर पूछा कि बताओ, मैं कहां था? मैं पहली कोशिश में जवाब नहीं दे पाया। जब मैंने पूछा कि ‘इतने सारे अलग-अलग देशों के छात्र वहां कैसे बैठे हैं?’ तब उसने बताया कि अमेरिका समेत 40 देशों के सैकड़ों छात्र बौद्ध धर्म की पढ़ाई करने के लिए का-निंग शेद्रुब लिंग मठ में आते हैं, जो महान बोधनाथ स्तूप के उत्तर में कुछ ही मिनट की पैदल दूरी पर है। तभी हमारी बातचीत इस बारे में होने लगी कि हर साल हजारों नेपाली छात्र ऐसी डिग्री और अवसरों की तलाश में ऑस्ट्रेलिया, भारत, ब्रिटेन, अमेरिका और दूसरे देशों के विश्वविद्यालयों में जाते हैं, जो नेपाल में उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन एक छोटा-सा शैक्षणिक प्रवास विपरीत दिशा में भी हो रहा है, जिसकी जानकारी हमें नहीं है। ये छात्र बौद्ध धर्म की पढ़ाई के लिए काठमांडू आते हैं। कुछ छोटी अवधि के समर इंटेंसिव कोर्सेस में दाखिला लेते हैं और बाद में उन क्रेडिट्स को विदेशी विश्वविद्यालयों में ट्रांसफर कर लेते हैं। वहीं कुछ छात्र रंगजुंग येशे इंस्टीट्यूट (आरवाईआई) में काठमांडू यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर बुद्धिस्ट स्टडीज द्वारा संचालित सेमेस्टर एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत पढ़ाई करने रुक जाते हैं। 30 साल पहले स्थापित यह संस्थान एक छोटे छात्र समूह के तौर पर शुरू हुआ, जो तिब्बती बुद्धिस्ट शिक्षक चोक्यी न्यिमा रिनपोछे से पढ़ना चाहते थे। जल्द ही इसके संस्थापकों को लगा कि यदि बौद्ध शिक्षा को अंतरराष्ट्रीय प्रामाणिकता दिलानी है, तो उसे यूनिवर्सिटी फ्रैमवर्क में लाना पड़ेगा। 2002 में संस्थान ने औपचारिक रूप से काठमांडू यूनिवर्सिटी के साथ साझेदारी कर सेंटर फॉर बुद्धिस्ट स्टडीज की स्थापना की। तब यहां केवल 36 छात्र थे। आज इसके मान्यता प्राप्त डिग्री कोर्सेस में 169 छात्र पंजीकृत हैं और हर साल करीब 100 छात्र समर इंटेंसिव कोर्स भी करते हैं। मेरा दोस्त अलग-अलग धर्मों के छात्रों द्वारा बौद्ध धर्म की पढ़ाई किए जाने की खूब प्रशंसा कर रहा था। छात्रों का यह कार्य देखकर मुझे 1968 की फिल्म ‘अनोखी रात’ में महान गायक मुकेश का गाया एक गीत याद आ गया- ‘ओह रे, ताल मिले नदी के जल में, नदी मिले सागर में, सागर मिले कौन से जल में, कोई जाने ना।’ मैं सोच रहा था कि इस गीत के बोल दुनिया भर में बदलते शिक्षा पैटर्न पर कितने अच्छे-से फिट बैठते हैं। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) जम्मू का ही उदाहरण लें, जिसने इस अकादमिक वर्ष में ‘यूनिफाइड इंजीनियरिंग’ नाम से नया बीटेक प्रोग्राम शुरू किया है। यह उन छात्रों के लिए तैयार किया गया है, जो पारंपरिक सिंगल-डिसिप्लिन इंजीनियरिंग से आगे बढ़ना चाहते हैं। यह प्रोग्राम जेईई एडवांस्ड के अभ्यर्थियों के लिए खुला है और इसका पाठ्यक्रम पूरी तरह री-डिजाइंड और व्यावहारिक है, जिसमें इंजीनियरिंग के कई क्षेत्रों को साथ जोड़ा गया है। इसका उद्देश्य सिस्टम इंजीनियर, प्रोडक्ट डेवलपमेंट इंजीनियर, ऑटोमेशन स्पेशलिस्ट और एआई प्रोफेशनल जैसी क्रॉस-फंक्शनल भूमिकाओं के लिए ग्रेजुएट्स तैयार करना है। सोच रहे हैं कि ऐसी क्रॉस-फंक्शनल भूमिकाएं क्यों जरूरी हैं? आजकल लोकप्रिय हो रहे इलेक्ट्रिक वाहनों को ही लीजिए। ये वाहन बाजार में अच्छा प्रदर्शन करें, यह सुनिश्चित करने के लिए आपको मैकेनिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, रोबोटिक्स और एआई के विशेषज्ञों की जरूरत होती है। इसी तरह स्मार्ट सिटीज के लिए सिविल इंजीनियरों, डेटा विश्लेषकों और सस्टेनिबिलटी पढ़ने वालों की भी आवश्यकता होती है। यानी इंजीनियरिंग शिक्षा के रास्ते अब पहले से कहीं अधिक व्यापक होते जा रहे हैं। फंडा यह है कि अगर आप सचमुच ज्ञानवान बनना चाहते हैं तो आपको ‘ताल’ से निकलकर ‘नदी’ की मदद लेनी होगी, ताकि आप ‘ज्ञान के सागर’ तक पहुंच सकें।
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