एन. रघुरामन का कॉलम:  पक्के इरादे का बीज आपको त्याग से सफलता तक ले जाता है
टिपण्णी

एन. रघुरामन का कॉलम: पक्के इरादे का बीज आपको त्याग से सफलता तक ले जाता है

Spread the love




सफलता उन्हीं को मिलती है, जो समाज के तानों, शारीरिक सीमाओं या अनजान चीजों के डर से नहीं डिगते। यहां दो उदाहरण पेश हैं। 1. ईश्वर ने हर प्रजाति की मां को शक्ति दी है कि वह अपनी भूख पर काबू करके बच्चों को खिला सके। इंसान इसमें सबसे आगे हैं। चाहे वे बहुत भूखे हों और हफ्तों से अच्छा खाना न खाया हो, फिर भी उनमें कुछ ऐसी ताकत होती है कि वे आंखों या चेहरे पर ऐसे भाव नहीं आने देते। ईश्वर ने उन्हें सिखाया है कि जब बच्चे भरपेट खाएं तो वे चेहरे पर खुशी रखें। 19 साल की रिया सोलंकी की मां साक्षी सोलंकी के पास एक दिन या महीना नहीं, बल्कि बीते आठ वर्षों से यही ताकत थी। 2018 में जब से उनकी बेटी ने शॉट पुट की ट्रेनिंग शुरू की, तब से साक्षी खुद भूखी रहकर उसे पौष्टिक खाना खिला रही हैं। घरों में कामकाज कर गुजारा करने वाली साक्षी के लिए एथलीट बेटी को जरूरी पोषण की व्यवस्था कर पाना जीवन का सबसे कठिन काम था। गरीबी में जैसे-तैसे काम चला रहे परिवार में बड़ों के खाने में कटौती कर 11 वर्ष की बच्ची के लिए प्रोटीन से भरपूर खाना दे पाना सबसे बड़ी चुनौती थी। इसके अलावा, जन्म से ही रिया की कोहनी के नीचे बायां हाथ नहीं था। भूखे माता-पिता से पहले पौष्टिक खाना खाते हुए बच्ची को भी बुरा लगता था। जब वह प्लेट से थोड़ा खाना देने की कोशिश करती तो माता-पिता मुस्कराकर कहते कि ‘हमारा पेट भर चुका’, जबकि वे लंबे समय से भूखे होते। लेकिन इस हफ्ते ही इस त्याग का फल परिवार को मिल गया। मेरठ की एक हाउसमेड की बेटी ने भुवनेश्वर में आयोजित नेशनल पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में शॉट पुट में गोल्ड मेडल जीता। यह एक ऐसे परिवार के आ​र्थिक संघर्षों का अंत था, जिसमें एक ड्राइवर पिता ने अपना खेल का सपना छोड़ा और मां ने अतिरिक्त कमाई के लिए घरेलू काम किया, ताकि एथलीट की पोषण जरूरतें पूरी हो सकें। अब उसका लक्ष्य एशियन गेम्स है। 2010 में साक्षी को 150 रुपए रोजाना में हाउसमेड का काम मिला था। उनके लिए यह बड़ी रकम थी, क्योंकि पहले उन्हें 250 रुपए महीने मिलते थे। तभी उन्होंने तय किया कि अब उनके पति घर पर बच्चों की देखभाल करेंगे और वह काम जारी रखेंगी। समाज ने पति को ताने मारे कि ‘बीवी की कमाई खाता है।’ लेकिन परिवार डटा रहा और आज कहानी अलग है। एक कमरे वाले किराए के घर में आज जश्न है। 2. अब महाराष्ट्र के माओवाद प्रभावित गढ़चिरोली का दूसरा उदाहरण देखिए। अच्छी बारिश के बावजूद कोई किसान हर साल प्रति एकड़ 50 हजार रुपए से ज्यादा नहीं कमा पाता था। उन्हें कहा गया कि स्ट्रॉबेरी उगाकर वे लाखों कमा सकते हैं। किसान हंसे, क्योंकि वे यह भी नहीं जानते थे कि स्ट्रॉबेरी दिखती कैसी है। किसान पवीरा राव कहते हैं, ‘जब मैंने पहली बार अधिकारियों से स्ट्रॉबेरी के बारे में सुना तो इंटरनेट पर देखा कि यह दिखती कैसी है। खेती से पहले हममें से कइयों ने इस फल के बारे में सुना भी नहीं था’। उन्होंने अपनी 5 एकड़ जमीन में से आधे एकड़ में स्ट्रॉबेरी उगाई । अब मार्च के अंत में वे 400 रुपए प्रति किलो वाली फसल काट रहे हैं। गढ़चिरोली प्रमुखत: धान का इलाका है, लेकिन कृषि विभाग वैकल्पिक फसलों को भी बढ़ावा दे रहा है। स्ट्रॉबेरी का यह प्रयोग 2019 में दो-तीन किसानों से शुरू हुआ, लेकिन धीरे-धीरे 50 किसानों और 12 एकड़ की खेती तक पहुंच गया। गढ़चिरोली जिले का मुचेरा स्ट्रॉबेरी बेल्ट बन रहा है, क्योंकि वहां महाबलेश्वर जैसा पहाड़ी इलाका है। फंडा यह है कि असल बदलाव तब शुरू होता है, जब हम दीर्घकालीन लक्ष्य के लिए तात्कालिक आराम छोड़कर त्याग करने का साहस रखते हैं। चाहे फिर वह अपने बच्चे के एथलेटिक्स के सपने पूरे करने के लिए मां की चुपचाप सहन की गई भूख हो या एक नई फसल उगाने के लिए किसान का उठाया गया कदम हो।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *