एन. रघुरामन का कॉलम:  परीक्षा देने वाले बच्चों को 1990 के दशक की जीवनशैली का छोटा-सा हिस्सा दें
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एन. रघुरामन का कॉलम: परीक्षा देने वाले बच्चों को 1990 के दशक की जीवनशैली का छोटा-सा हिस्सा दें

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16 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

‘परीक्षा उद्या पसून, आता कुठे जातो,’ मुंबई में सोमवार को आगे वाले गेट से बस में चढ़ते एक विद्यार्थी से ड्राइवर ने यह बात पूछी। मैं वहां इंतजार कर रहा था कि बस निकले तो मैं सड़क पार करूं। इसलिए मैंने वो बातचीत सुन ली। लड़के ने बताया कि उसके हॉल टिकट में प्रिंट त्रुटियों के कारण वह परीक्षा केंद्र को लेकर कन्फ्यूज हो रहा है।

वह यह समस्या सुलझाना चाहता है, ताकि महाराष्ट्र में 10 फरवरी से शुरू हो रही एचएससी परीक्षाओं को टेंशन फ्री होकर दे सके, जिसमें उसके जैसे 3,52,951 छात्र बैठेंगे। ऐसे ही 20 फरवरी को उससे दो साल जूनियर 3,48,899 छात्र एसएससी की परीक्षा देंगे।

मुंबई के सिविक ट्रांसपोर्ट ने इन छात्रों के लिए न सिर्फ अतिरिक्त बसें चलाई हैं, बल्कि परीक्षा अवधि में इन छात्रों को पीछे वाले गेट पर होने वाली भीड़भाड़ से बचाने के लिए आगे के दरवाजे से चढ़ने के लिए भी कहा है। ड्राइवर ने कहा, ‘अरे चिंता न करो, आ जाओ।

मैं तुम्हें जल्दी पहुंचा दूंगा। मुझे यकीन है कि तुम्हारी समस्या सुलझ जाएगी।’ इन शब्दों से लड़के को सुकून मिला। वह मुस्कराया और आगे वाले गेट से चढ़ने पर कुछ यात्रियों के असहज हुए चेहरों को भी अनदेखा कर गया।

बस आगे बढ़ी और मैं सड़क पार करते हुए सोचने लगा कि अपनी पहली या दूसरी प्रतियोगी परीक्षा देने जा रही इस नई पीढ़ी के साथ अंत समय पर ऐसी गलतियां होती हैं तो वह क्या सोचती होगी। जब मैंने 1970 के दशक की शुरुआत में यही परीक्षा दी थी तो हमारे साथ कोई नहीं चलता था।

हम स्कूल तक पैदल जाते, परीक्षा देते और अगली परीक्षा की तैयारी के लिए लौट आते। 2000 के दशक की शुरुआत में जब मेरी बेटी ने परीक्षा दी तो माता-पिता में से कोई एक जरूर साथ जाता, ताकि वह ट्रैफिक या किसी अन्य ऐसी परेशानी में न फंसे, जो अगली परीक्षा की तैयारी के लिए उसका मूड बिगाड़ दे।

आज हम ऐसे दौर में हैं, जहां कंप्यूटर की गड़बड़ी, अचानक बिजली जाने और परिवहन व्यवस्था ठप होने जैसी आम समस्याओं के कारण हम समय की कमी से जूझते रहते हैं। और हमने 1990 का दशक भी देखा है, जब हमारे पास खूब समय था। क्योंकि तब दुनिया इतनी तेज नहीं थी और हमारे तीन सेकंड के बचे अटेंशन स्पान का आकलन करने वाली एल्गोरिदम नहीं थी।

उन दिनों हाउसिंग सोसायटी कॉलोनी के सभी बच्चों को परीक्षा की शुभकामनाओं के साथ चॉकलेट बार भेजती थी। सोसायटी के कुछ संपन्न लोग अच्छे इंक पेन के साथ शुभकामना भेजते। सोसायटी नोटिस जारी करती कि लाउड म्यूजिक नहीं बजेगा। क्लब हाउस मनोरंजन के लिए नहीं, परीक्षा तैयारी करने वाले छात्रों के लिए खुलेगा।

कुछ लोग चाय-कॉफी देते, ताकि बच्चे न सिर्फ वॉर्म रहें, बल्कि पढ़ाई के लिए जागते रहें। कार वाले लोग पैरेंट्स को मैसेज करते थे कि जरूरत पड़ी तो वे बच्चों को एग्जाम सेंटर तक छोड़ देंगे। सभी लोगों का यह सामूहिक प्रयास महज इसलिए होता था कि बच्चे सफल हों।

आज हम सबकी लाइफ स्टाइल कहीं ज्यादा ऊंची है। हर घर संपदा इकट्‌ठी करने में दूसरे से होड़ कर रहा है। हम किसी से मदद मांगने में झिझकते हैं। दुनिया दौड़ रही है। और शायद इसीलिए हम कई बार यह भी नहीं देख पाते कि पड़ोसी का बच्चा बस स्टॉप पर बेचैनी से बस का इंतजार कर रहा है।

फंडा यह है कि चूंकि देश भर में एसएससी और एचएससी की परीक्षाएं शुरू होने वाली हैं, तो आइए इन बच्चों को 1990 के दशक की जीवनशैली का छोटा-सा हिस्सा दें। शायद यही व्यवहार उनका और हमारा दिन बेहतर बना दे।

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