एन. रघुरामन का कॉलम:  बच्चे की पसंद और नापसंद उसके जन्म से पहले तय हो सकती हैं
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एन. रघुरामन का कॉलम: बच्चे की पसंद और नापसंद उसके जन्म से पहले तय हो सकती हैं

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‘भूख लग रही है बच्चा? बस मुझे थोड़ा समय दो। मैं जल्दी से गाजर और बीन्स को घर में उगाई पालक से मिलाकर एक बढ़िया सब्जी बना देती हूं, जिसे तुम अपनी रोटी के साथ बड़े चाव से खाओगे।’ मैंने एक बार रसोई में अपनी मां को यह कहते सुना था। बैठकखाने से मैं मौसी को देख सकता था, जो अपनी गर्भावस्था के आखिरी दो महीनों में हमारे यहां रहने आई थीं। वे रसोई के भीतर एक कुर्सी पर पसरी गहरी नींद में थीं। मैंने मां से पूछा, “आप किससे बात कर रही हैं, मौसी तो गहरी नींद में हैं?’ मां ने कहा, “तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो और उस नन्हे बच्चे से हो रही मेरी बातचीत में दखल मत दो। मौसी सो नहीं रही हैं; वे अनकम्फर्टेबल महसूस कर रही हैं और आंखें बंद करके बैठी भर हैं।’ मैं वापस पढ़ने चला गया और मां भोजन पकाते समय उसकी रेसीपी तक बोल-बोलकर सुनाती रहीं। मुझे यह बातचीत एक युवा मां के घर जाने पर याद हो आई। वो अपने बच्चे के पीछे भागते हुए कह रही थी, “प्लीज, अपनी सब्जियां खा लो, फिर मैं कार्टून लगा दूंगी।’ आज अधिकांश युवा पैरेंट्स इस तरह के दृश्य से परिचित होंगे, जिसमें मांएं इसी तरह से अपने बच्चों से मनुहार करती हैं। जब मेरी हंसी छूट गई तो उसने कहा, “अंकल, बचपन में आप भी तो अपने पैरेंट्स को सब्जियां खाने के लिए इसी तरह से तंग करते होंगे।’ तब मैंने उसे उपरोक्त प्रसंग सुनाया। उसने पूछा, “आपकी मां किससे बात कर रही थीं?’ मैंने कहा, “हमारे जमाने में बच्चे को सब्जियां पसंद करवाने की शुरुआत शायद उसके जन्म से पहले ही हो जाती थी!’ और केवल सब्जियां ही नहीं, बल्कि कर्नाटकी संगीत गाना, कहानियां सुनाना और पौराणिक पुस्तकों को ऊंची आवाज में पढ़कर सुनाना भी गर्भावस्था के अंतिम महीनों की दिनचर्या का हिस्सा हुआ करते थे। क्योंकि हमारे माता-पिता का मानना था कि बच्चे की पसंद और नापसंद उसके जन्म से पहले, गर्भ के भीतर ही आकार लेने लगती हैं। मॉडर्न पैरेंट्स, त्योरियां चढ़ाकर कुछ कहने की कोशिश मत कीजिए। पहले मुझे अपनी बात समझाने दीजिए। हमारे बड़े परिवार में मेरे कुछ कजिन्स या तो हमारे घर में जन्मे थे, या उनके जन्म से पहले के आखिरी दो महीनों में मेरी मां उनके घर जाकर रही थीं। मैं अपने सभी चचेरे-ममेरे भाई-बहनों में सबसे बड़ा हूं। हम सबमें एक बात समान है। हमें सब्जियां और दही पसंद हैं, कर्नाटकी संगीत प्रिय है, और हममें से अधिकतर कई भाषाओं- जिनमें संस्कृत भी शामिल है- और कहानी सुनाने की कला में अच्छे हैं। यह गुण मेरी मां में भी था। यूके स्थित डरहम यूनिवर्सिटी की प्रो. नाद्जा रीसलैंड ने ठीक इसी विषय पर शोध किया है और पाया है कि जिन सब्जियों की गंध से बच्चों का गर्भ में रहते हुए ही बार-बार परिचय कराया जाता है, उनके प्रति जन्म के बाद उनमें नकारात्मक प्रतिक्रिया की संभावना कम हो सकती है। रीसलैंड ने स्वीकारा, “अपनी रिसर्च के आधार पर हम कह सकते हैं कि गर्भावस्था के अंतिम चरण में किसी विशेष स्वाद के संपर्क में आने से बच्चों में लंबे समय तक रहने वाली स्वाद-स्मृतियां बनी रह सकती हैं, जो जन्म के कई वर्षों बाद तक उनकी भोजन संबंधी पसंद को प्रभावित कर सकती हैं।’ उन्होंने आगे कहा, “यदि भ्रूण को कुछ खान-पान की आदतों का अभ्यस्त बना दिया जाए, तो आगे चलकर वह स्वस्थ भोजन करने में कहीं अधिक रुचि ले सकता है।’ इस अध्ययन में फ्रांस, नीदरलैंड्स, कैम्ब्रिज और एस्टन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता भी शामिल थे। एस्टन यूनिवर्सिटी ने इस कार्यक्रम को वित्तपोषित किया था। जब मैंने सह-लेखकों में से एक की यह टिप्पणी पढ़ी कि “ये निष्कर्ष खानपान के बारे में शुरुआती हस्तक्षेपों पर सोचने के नए रास्ते खोलते हैं’, तो मुझे अपने माता-पिता और बुजुर्गों पर बहुत गर्व हुआ, जो शायद इन शोधकर्ताओं के समझने से बहुत पहले ही यह बात जानते थे। संभवतः उन्होंने यह सीख उस प्रसिद्ध कथा से ली थी, जिसमें अभिमन्यु मां के गर्भ में रहते हुए ही चक्रव्यूह को भेदना सीख लेता है। ऐसे नए शोध हमारी पुरानी परंपराओं के प्रति नई रुचि जगाते हैं। फंडा यह है कि हमारे बुजुर्गों की कुछ परंपराएं भले ही आज लोगों की त्योरियां चढ़ा दें, लेकिन उन्होंने हमारा कोई नुकसान तो नहीं किया है। फिर आज की गर्भवती युवा मांओं के लिए कम-से-कम भोजन से जुड़ी उस परंपरा को अपनाने में क्या बुराई है? इस विषय पर अपनी राय मुझे अवश्य लिख भेजिए।



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