एन. रघुरामन का कॉलम:  बिना भरोसे से क्विक कॉमर्स ने खरीदार और दुकानदारों को बदल दिया है
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एन. रघुरामन का कॉलम: बिना भरोसे से क्विक कॉमर्स ने खरीदार और दुकानदारों को बदल दिया है

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1 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

कोविड के बाद कुछ वर्षों तक मैं परफ्यूम ऑनलाइन ही खरीदता था। क्योंकि ये सुविधाजनक था। घर पर डिलीवरी होती थी। ऑनलाइन-ऑफलाइन की प्रक्रिया भी एक जैसी थी और ये कांच की बोतलों की सार संभाल भी कर लेते थे। लेकिन बीते एक साल से मैंने ऑनलाइन खरीदारी बंद कर दी। क्योंकि कुछेक बार मुझे खराब अनुभव हुआ।

मंगाया गया सामान मुझे नहीं मिला, बोतलें टूटी हुई और दूसरे फ्रेगरेंस की बोतल भेज दी गई। इसे बदलने में भी बहुत समय लगा, जिसके कारण मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ गया। इसने मुझे कैश ऑन डिलीवरी (सीओडी) मोड पर खरीदने के लिए मजबूर किया। लेकिन क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म सीओडी मोड पर ज्यादा पैसे लेने लगे।

उन्होंने 50 रुपए तक के कई अतिरिक्त शुल्क भी जोड़ना शुरु कर दिया। इसीलिए मैं सभी गैर जरूरी चीजें अपनी यात्राओं के दौरान हवाई अड्डों पर स्थित दुकानों से खरीदने लग गया। बोर्डिंग गेट पर इंतजार के वक्त मुझे कभी नहीं लगा कि मेरा समय व्यर्थ हो रहा है। इसके अलावा उन दुकानों पर टेस्टर भी उपलब्ध थे, जिससे मुझे सही फ्रेगरेंस चुनने में सहायता मिलती थी।

ऐसा मैं अकेला नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं के एक पूरे वर्ग को तत्काल डिलीवरी मांगने पर बिल में जोड़े गए शुल्क चुभने लगे हैं। बाजार के बड़े हिस्से पर दबदबा रखने वाले प्लेटफॉर्म बिल में कई सारे शुल्क जोड़ने लग गए हैं, जैसे हैंडलिंग चार्ज, डिलीवरी चार्ज, स्मॉल कार्ट शुल्क, बरसात का शुल्क और कभी-कभी सर्ज फीस।

इससे वाकई में बिल बहुत बढ़ जाता है। इसका परिणाम यह हुआ कि हमारे घरों के आसपास के स्थानीय दुकानदारों ने अब अपनी रणनीति बदल दी। वे अब क्विक कॉमर्स से भी अधिक त्वरित हो गए हैं। उन्होंने डिलीवरी करने वाले लड़कों में निवेश किया और वो चाहते हैं कि पड़ोस के ग्राहक सिर्फ उनसे ही सामान खरीदें।

वे अपने दिमाग में एक नक्शा बना लेते हैं कि वे कहां तक सामान की डिलीवरी कर सकते हैं। और वो ऐसा इसलिए करते हैं ताकि उनकी बिक्री चलती रहे। जाहिर है कि ये दुकानदार डिलीवरी करने वाले लड़कों की तनख्वाह पर खर्च के लिए तैयार हैं और इस खर्च की भरपाई के लिए वे अधिक से अधिक इलाकों में पहुंच बनाते हैं। इससे उनकी बिक्री बढ़ती है। इस उपाय से उनकी दुकानों पर भी व्यस्तता रहने लगी है, जो पहले सिर्फ वहां तक आने वाले ग्राहकों की सेवा तक ही सीमित थीं।

खरीदारों की आदत में एक बड़ा बदलाव यह भी आया है कि वे अब कुछेक ऑर्डर एक साथ मिला कर खरीदारी करते हैं, ताकि हर ऑर्डर पर अतिरिक्त शुल्क देने से बचा जा सके। इन दिनों डिलीवरी बॉय बड़े थैलों के साथ आते है, जो महज छह माह पहले तक छोटे—छोटे थैले लेकर आते थे। पहले ग्राहक यह नहीं देखते थे कि वे क्विक कॉमर्स के जरिए कितनी बार ऑर्डर कर रहे हैं। लेकिन अब ये आदत नहीं रही।

आपात स्थिति में टमाटर, कड़ी पत्ता जैसी सब्जियां और अन्य उपभोग की चीजें अब समीप के दुकानदारों से ली जा रही हैं, जो इन्हें 10 मिनट डिलीवरी प्लेटफॉर्म से भी अधिक तेजी से पहुंचाने के लिए तैयार हैं। ये उन प्लेटफॉर्म्स के लिए भी सुविधाजनक है, जो कम मूल्य की उन छोटी-छोटी खरीदारियों को हतोत्साहित करना चाहते हैं, जो शुरुआती तौर पर हमें आलसी बनाने के लिए थीं। चूंकि हम उपभोक्ता जल्दी से आलस्य की बीमारी में फंस गए तो इन प्लेटफॉर्म ने अपनी तिजोरी भरने के लिए कई प्रकार के शुल्क लगाना शुरू कर दिया।

और अंत में यह चक्र पूरा हुआ। ग्राहक अब भी आलसी बने हुए हैं और सामान खरीदने के लिए घर से बाहर नहीं जाना चाहते। दुकानदारों ने डिलीवरी प्लेटफॉर्म की ओर चले गए उपभोक्ताओं को वापस लाने के लिए डिलीवरी बॉय की सेवाएं जोड़ दीं। कुछ ग्राहक बाहर जाकर सामान खरीदने को तैयार हो रहे हैं। और प्लेटफॉर्म उन अमीर ग्राहकों को सेवा देकर खुश हैं, जो घर पर बैठकर सामान अपने दरवाजे पर मंगाना चाहते हैं।

फंडा यह है कि इससे पहले कि खरीदारी के ये आधुनिक साधन हमारी जेब से ज्यादा पैसा ले उड़ें, हमें उस आपसी भरोसे और व्यक्तिगत संबंधों की ओर वापस लौटना होगा, जो कभी हम दुकानदारों के साथ रखते थे।

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