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- N Raghuraman Column: Accepting Help In Relationships Is A Feeling, Not A Favor
2 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
इस रविवार को जरा सोचिए कि कितनी बार मां ने अपनी दोस्त के हाथों आपका पसंदीदा अचार भेजने की पेशकश की होगी? आपको मना करने का अपना तर्क भी याद होगा, ‘मां, मैं यहां इसे शिपिंग खर्च से भी सस्ते में खरीद सकता हूं। और प्लीज, अपनी दोस्त को मेरे ऑफिस मत भेजा करो, वे पूरा माहौल स्कैन करती हैं।’ यदि आपने मां का चेहरा देखा होता तो उनकी चमक कम होती दिखती। फोन रखने पर भी वे उदास रहती हैं। धीरे से कहती हैं, ‘बहुत बदल गया।’ फिर अपने आराध्य से आपको सेहतमंद रखने की प्रार्थना करती हैं। वह जार किनारे रख कर उम्मीद करती हैं कि किसी चमत्कार से यह आप तक पहुंच जाए।
पिताजी आकर कहते हैं, ‘फिर मना कर दिया? मुंबई में सब कुछ मिलता है।’ वह साड़ी से मुंह पोंछते हुए खराब तेल और कीटनाशकों की बात कहती हैं। किसी को अहसास नहीं होता कि वे आंसू भी पोंछ रही थीं। आपको अंदाजा नहीं कि उस इनकार की कीमत क्या है। उनके इस भाव पर इनकार से आप महज खाना ही नहीं, बल्कि उनकी अहमियत को भी ठुकराते हैं। उन्हें लगता है कि उनकी जरूरत नहीं रही, वह दूर हो गई हैं। उनके लिए भावनाओं की यह दूरी किलोमीटरों की दूरी से कहीं ज्यादा है।
उन्हें वो दो दशक याद आते हैं, जब आप उनके बिना खाना नहीं खाते थे। वो बच्चा उनका खाना मांगता था, आज का आदमी बोलता है– ‘मैं मैनेज कर लूंगा’। वह अचार आपके कहने पर नहीं, बल्कि अपनी अहमियत के अहसास के लिए भेजती हैं। और आपका प्रत्येक ‘मैं मैनेज कर लूंगा’ इस अहसास को कम करता है।
बात ऑर्गेनिक नींबू की नहीं, बल्कि आपके जीवन में उनकी भूमिका की है। अपनी जो दोस्त वो भेज रही थीं, जिसे आप नपसंद करते हैं– उनके लिए महाभारत की ‘संजय’ हैं। वही उन्हें सटीकता से वो सब बताएंगी, जो मां आपके बारे में जानना चाहती हैं। शायद वो ये भी पूछ लें कि ‘वहां उसके लिए कोई अच्छी लड़की दिखी क्या?’
मैंने यह बात देर से समझी, तो मेरी गलती मत दोहराइए। छोटी–छोटी मदद स्वीकार करना आपकी जरूरतों से जुड़ा मामला नहीं, बल्कि प्रियजनों को उनकी अहमियत का अहसास कराना है। मां आपके ऑफिस या डेटिंग रिजेक्शन के तनाव कम नहीं कर सकतीं, लेकिन वह जानती हैं कि उनका खाना आपको थोड़ी राहत जरूर देगा। इसलिए, उन्हें यह करने दीजिए। जब मेरी मां नहीं रहीं, तो मुझे वो अचार वाले कॉल और वो स्वाद बहुत याद आता था। वह ऐसी आत्मा थीं, जो देना ही जानती थीं– चाहे पापड़ हो या अचार, लेकिन कभी एक साड़ी तक नहीं मांगी। मैंने पिताजी के साथ यह गलती नहीं दोहराई।
ऊंची तनख्वाह के बावजूद वे मुझे यह कहते हुए पैसे देते कि ‘काम आएंगे।’ मैंने भी कभी मना नहीं किया, ताकि उन्हें लगे कि अब भी मेरे खर्चों में उनकी भूमिका है। 2008 में मैं नासिक में घर खरीदने वाला था तो उन्होंने अपना अकाउंट खाली करके मुझे 71 हजार रुपए दिए। भले वो राशि कम थी, लेकिन मेरे लिए ‘अक्षयपात्र’ बन गई। मुझे घर खरीदने के लिए उधार नहीं लेना पड़ा। आज भी जब हम उस घर को बेचने की सोचते हैं तो उनका प्यार और बुजुर्ग के तौर पर उनकी भूमिका हमें रोकती है। मानो, वह आसपास ही हैं।
यह बात बेंजामिन फ्रैंकलिन के पेनसिल्वेनिया लेजिस्लेचर का कार्यकाल (1785-88) याद दिलाती है। एक कट्टर विरोधी का दिल जीतने के लिए उन्होंने किसी मदद की पेशकश नहीं की, जो वे कर सकते थे। इसके बजाय उससे एक दुर्लभ किताब मांगी। विरोधी मान गया और दोनों जीवनभर के दोस्त बन गए। यही इंसानी मनोविज्ञान है। जब लोग आपके लिए कुछ करते हैं, तो वे खुद को समझा लेते हैं कि उन्हें आप पसंद हैं।
फंडा यह है कि एहसान के लिए नहीं, बल्कि रिश्ते में प्रेम और परवाह का अहसास बनाए रखने के लिए अपनों की मदद को स्वीकार करना चाहिए।









