एन. रघुरामन का कॉलम:  विद्यार्थी अपना करिअर एआई-प्रूफ बनाने के तरीके खोज रहे हैं
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एन. रघुरामन का कॉलम: विद्यार्थी अपना करिअर एआई-प्रूफ बनाने के तरीके खोज रहे हैं

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वह इंश्योरेंस में करिअर बनाने की सोच रहा था, जहां उसने कभी दो महीने की इंटर्नशिप भी की थी। लेकिन इस गर्मी से पहले 22 साल के उस युवक ने अचानक इरादा बदल दिया और अब फुल-टाइम इलेक्ट्रिशियन बन रहा है। उसने इस गर्मी में मेट्रो सिटी में शिफ्ट होने का फैसला कर लिया और नए काम में हाथ आजमाना चाहता है। इस निर्णय के दो कारण हैं। पहला, उसे डर है कि एआई से उसकी नौकरी को खतरा हो सकता है, क्योंकि उसमें ज्यादातर काम डेटा एंट्री का है और इस फील्ड में आगे बढ़ने पर भी वह असुरक्षित रहेगा। दूसरा, उसे पता चला कि दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसी मेट्रो सिटी में कुक, नैनी, मेड, केयरटेकर, ड्राइवर और सिक्योरिटी गार्ड के अलावा अन्य स्किल्ड वर्कर्स की कमी हो सकती है। क्योंकि रिक्रूटमेंट सर्विस फर्म्स और अन्य प्लेटफॉर्म्स का कहना है कि इनमें 10 में से लगभग 3 लोग आगामी विधानसभा चुनावों में अपने घर लौट रहे हैं। अधिकतर एक महीना या ज्यादा की छुट्टी ले रहे हैं। ये प्लेटफॉर्म्स ज्यादा सैलरी और इंसेंटिव देकर इस कमी को पाटने की कोशिश में लगे हैं। वह यह देखने के लिए दोस्त के साथ मेट्रो सिटी शिफ्ट होना चाहता है कि नया करिअर कैसे शुरू कर पाएगा। करिअर में मदद की अपनी क्षमता के साथ एआई कार्यस्थलों को कैसे प्रभावित करेगा, यह बात आज तक इकोनॉमिक पेपर्स का ही विषय ज्यादा रही है। ठोस सबूत कम ही हैं। लेकिन खासकर लंबे करियर की शुरुआत कर रहे युवाओं ने एआई को ध्यान में रख कर भविष्य की दिशा तलाशनी शुरू कर दी है। कुछ लोग ब्लू कॉलर जॉब की ओर जा रहे हैं या अपना बिजनेस शुरू कर रहे हैं, ताकि एआई के असर से बच सकें। वहीं, कुछ लोग एआई से भी आगे रहने की कोशिश में हैं। कामकाजी आबादी से ज्यादा विद्यार्थी एआई के बारे में सोच रहे हैं और वे जानते हैं इसका असर पड़ेगा। हालांकि, उन्हें स्पष्ट नहीं पता कि असर कितना और कैसा होगा। दुनिया भर के स्टूडेंट्स दिन में कम से कम एक बार इंटरनेट पर सर्च करते हैं कि उनके भावी करियर पर एआई का क्या असर पड़ेगा। अमेरिका के नेशनल स्टूडेंट्स क्लियरिंग हाउस डेटा के अनुसार, हाल के वर्षों में वहां वोकेशनल फोकस्ड कम्युनिटी कॉलेजों में एनरोलमेंट तेजी से बढ़ा है और यह 2020 के मुकाबले करीब 20% तक बढ़ा है। जैसे पहले पैरेंट्स हमें टाइपिंग और शॉर्टहैंड क्लास में भेजते थे, वैसे ही आज वे बच्चों को प्लंबिंग और इलेक्ट्रिकल कोर्सेस के लिए वोकेशनल कॉलेजों में भेज रहे हैं। कई एमबीए स्टूडेंट्स ने आईपीएल से जुड़े गिग बिजनेस शुरू किए हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि आगामी महीनों में गिग वर्कर्स की मांग 25% तक बढ़ सकती है। फसल कटाई के सीजन के साथ ही पश्चिम बंगाल व केरल के विधानसभा चुनाव आ रहे हैं। ऐसे में बहुत-से वर्कर्स घरों को लौट रहे हैं। उन्हें यह भी लगता है कि इस वीकेंड से शुरू हो रहे आईपीएल सीजन से ऑर्डर्स बढ़ेंगे और राइडर्स की कमी के चलते उन्हें इस बिजनेस में हाथ आजमाने में मदद मिलेगी। उनका एकमात्र डर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर है। हां, उन्हें लगता है कि अगर युद्ध के कारण कच्चे माल की कमी से मैन्युफैक्चरिंग धीमी पड़ी तो डिलीवरी गिग वर्कफोर्स में जरूरत से ज्यादा लोग आ जाएंगे। कुछ अंडरग्रेजुएट स्टूडेंट्स का मानना है कि एग्रीकल्चर और कंस्ट्रक्शन के क्षेत्रों में एआई का असर कम होगा। एआई कंपनी एन्थ्रोपिक भी यह मानती है, लेकिन उसने चेतावनी भी दी है कि कंप्यूटर प्रोग्रामर्स और कस्टमर सर्विस रिप्रजेंटेटिव की नौकरियां ज्यादा जोखिम में हैं। पिछले साल माइक्रोसॉफ्ट के एक विश्लेषण के भी यही निष्कर्ष थे। ओंटारियो के 21 साल के वेदांत व्यास जैसे विद्यार्थियों ने कॉलेज से छुट्टी लेकर एआई स्टार्टअप ‘ओपननोट’ में फुल-टाइम काम शुरू किया है। उनका मानना है कि कॉलेज कोर्सेस और वर्कफोर्स की नई हकीकत के बीच जुड़ाव अब पूरी तरह खत्म हो चुका है। फंडा यह है कि परिवारों में डिनर टेबल पर जब यह चिंता का विषय बन रहा है तो बेहतर होगा कि हम बच्चों को दो नावों की सवारी में मदद करें- पारंपरिक कॉलेज के कोर्स और पार्ट-टाइम ब्लू कॉलर कोर्स।



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