एन. रघुरामन का कॉलम:  2026 में एक नया रिजॉल्यूशन ‘डिजिटल डिटॉक्स’ लोकप्रिय हो रहा है
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एन. रघुरामन का कॉलम: 2026 में एक नया रिजॉल्यूशन ‘डिजिटल डिटॉक्स’ लोकप्रिय हो रहा है

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11 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

‘रघु, जरा रुको, मैं स्पीकर ऑन कर रहा हूं और रिक्वेस्ट करता हूं कि जो तुमने अभी हूल दी है, उसे दोहराओ।’ महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजी नगर में इंडस्ट्री चलाने वाले सफल बिजनेसमैन अनिल मिराशी ने यह बात कही। सुबह के नौ बजे थे और मुझे अंदाजा था कि अनिल के अलावा मेरी बात और कौन सुन रहा होगा।

मैंने अपने शब्दों की तीव्रता तो कम कर दी, लेकिन बचपन के दोस्तों के बीच के मजाक को कम नहीं करना चाहता था। हां, अनिल मेरा क्लासमेट है, तो मैंने कहा, ‘कमीने, याद है आज से करीब 38 साल पहले इसी दिन तुमने शादी की थी और कई दोस्तों के इस ग्रुप को बीच में ही छोड़कर भाग गए थे?

तुम्हें जरा भी अंदाजा है कि नागपुर में धरमपेठ चौराहे पर दिनशॉ आइसक्रीम शॉप के बाहर रात 9 बजे बिना किसी उद्देश्य के होने वाली वो मीटिंग कैसी दिखती थी, जब एक के बाद एक लोग वहां से चले गए। तुम्हारी ही तरह उसी साल तीन और लोग भी यही हरकत (लड़की के साथ भाग जाना) करके ग्रुप छोड़ गए और 9 बजे वाली मीटिंग अचानक से खत्म हो गई।

फिर भी, आज मैंने तुम्हें शादी की सालगिरह की बधाई इसलिए दी, क्योंकि तुमने हमारी भाभी बनी उस लड़की को रानी की तरह रखा है। इसलिए, आप दोनों को हैप्पी एनिवर्सरी।’ फोन पर दूसरी तरफ से जोरदार ठहाके लगे, क्योंकि इस मंगलवार अनिल की एनिवर्सरी पर मेरे कुछ क्लासमेट उसके घर जुटे थे और कुछ रास्ते में थे। मैं उन चंद लोगों में था, जो तयशुदा काम के चलते नहीं पहुंच पाए थे।

मेरे स्कूल और दूसरे सर्कल के मित्रों में हर चार में से एक व्यक्ति ने इस साल एक नया रिजॉल्यूशन लिया है। वजन घटाने, एक्सरसाइज करने और ड्रिंक्स छोड़ने जैसे परंपरागत संकल्पों के बीच नववर्ष का लोकप्रिय रिजॉल्यूशन बन रहा है- डिजिटल डिटॉक्स। यानी स्क्रीन पर टाइम बिताने के बजाय असल दुनिया में लोगों से मिलना या फिर एक घंटे की डूम स्क्रॉलिंग के बजाय फोन पर किसी दोस्त से बात करना।

सोशल मीडिया का इस्तेमाल कितना थकाऊ है? 2021 के एक अध्ययन में पाया गया कि सिर्फ 20 मिनट स्क्रॉल करना ही हमें मानसिक रूप से थका देता है और हमारी एक्सरसाइज की क्षमता घटाता है। 2022 के एक शोधपत्र से निष्कर्ष निकला कि खेल से पहले 30 मिनट सोशल मीडिया इस्तेमाल से मानसिक थकान होती है और उत्कृष्ट वॉलीबॉल खिलाड़ियों के हाथ-आंख का तालमेल प्रभावित होता है। इसलिए इच्छाशक्ति या आत्मनियंत्रण की कमी के लिए खुद को दोष देना बंद करें। जो लोग मानसिक स्वास्थ्य पर तकनीकी के बढ़ते असर को समझ रहे हैं, वे खुद को बचाने के कदम उठा रहे हैं। उनमें से कुछ यहां पेश हैं।

1. कुछ लोगों ने ‘ओपल’ ऐप का फ्री वर्जन डाउनलोड किया है, जो आईओएस और एंड्रॉयड पर वेबसाइट ब्लॉक करने या स्क्रीन टाइम सीमित करने की सुविधा देता है।

2. कुछ लोगों ने घर में टेक-फ्री जोन और टेक-फ्री समय तय किया है और फिजिकल मेल-मिलाप बढ़ाया है।

3. कुछ महीने में एक शनिवार या रविवार पूरी तरह स्क्रीन-फ्री रहकर परिवार के साथ समय बिता रहे हैं।

क्लिनिकल केयर पर रिसर्च प्रकाशित करने वाले अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल जामा नेटवर्क ओपन में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि जब युवा वयस्कों ने एक हफ्ते का सोशल मीडिया डिटॉक्स किया तो उनकी एंग्जायटी में 16, डिप्रेशन में 25 और अनिद्रा में 14% की कमी आई।

औसत सोशल मीडिया उपयोग 2 घंटे से घटकर 30 मिनट रह गया। लेकिन याद रखिए कि फोन पर बिताए समय का मतलब यह नहीं कि आप क्या कर रहे हैं, बल्कि यह है कि आप क्या नहीं कर रहे हैं। दोस्तों को कॉल करने जैसी चीजें आपके मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक रिश्तों को मजबूत कर सकती हैं। तकनीक की लत को खत्म करना आजादी जैसा हो सकता है।

फंडा यह है कि इंसान जब तक लत लगाने वाली तकनीक को काबू करने में पारंगत नहीं हो जाता, 2026 में रिजॉल्यूशन के तौर पर शामिल हुआ ‘डिजिटल डिटॉक्स’ आगामी वर्षों में भी स्थायी बना रहेगा।

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