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- Pt. Vijayshankar Mehta’s Column: When Happiness Enters Your Life, Strive To Ensure That Loneliness Does Not Increase.
8 घंटे पहले
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पं. विजयशंकर मेहता
उत्साह और उदासी दोनों संक्रामक हैं। किसी प्रसन्नचित व्यक्ति के पास बैठें तो अपने आप अच्छा लगने लगता है। जिसका मूड खराब हो, उसकी संगत मिले तो परेशानी हो सकती है। ये सब मनोरोग हैं और अब मनोरोग कई रूप में सामने आ रहा है। मेरा तो हर विषय परिवार पर केंद्रित रहता है।
पिछले दिनों विदेश यात्रा में फिनलैंड की राजधानी हेलसिंकी में टेक इंडस्ट्री में बड़े पद पर काम कर रहीं दो महिलाओं से मिलना हुआ। उनका कहना था हम भारतीय इस देश में खुश हैं, क्योंकि दुनिया में खुशहाल होने के मामले में फिनलैंड सबसे ऊपर है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि अब यहां अकेलेपन की बीमारी बढ़ रही है।
सोचने वाली बात है- खुशी अलग है, अकेलापन अलग है। चूंकि हमने अपनी खुशियों को सुविधाओं से, उपभोग से जोड़ लिया है तो उसकी तो कोई कमी है नहीं। लेकिन अकेलापन लंबे समय टिक जाए तो उदासी में बदलता है और उदासी बदल जाती है अवसाद में। तो जब खुशी आए तो कोशिश करें अकेलापन न उतर जाए।









