एन. रघुरामन का कॉलम:  2026 में नई स्किल के तौर पर ‘क्रिटिकल इग्नोरिंग’ सीखने की जरूरत है
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एन. रघुरामन का कॉलम: 2026 में नई स्किल के तौर पर ‘क्रिटिकल इग्नोरिंग’ सीखने की जरूरत है

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8 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

इस हफ्ते की शुरुआत में एक बड़ी कंपनी के 55 वर्षीय उच्च प्रबंधकीय अधिकारी ने मुझसे कहा कि ‘सर, आपके एक शुभचिंतक ने कहा है कि आप मुझे पसंद नहीं करते।’ कारण यह था कि पिछले तीन मौकों पर जब उन्होंने टॉप मोस्ट मैनेजमेंट के लिए बने वॉट्सएप ग्रुप में कुछ सुझाव लिखे तो मैंने तुरंत बताया कि उनका आइडिया गलत है और इसके कारण भी गिनाए।

मैं उस ग्रुप का हिस्सा हूं, जिसमें कंपनी के मालिक भी हैं और उन्होंने उसी ग्रुप में मेरे दृष्टिकोण की खुलकर तारीफ की। फिर भी यह सीनियर प्रोफेशनल किसी ऐसे व्यक्ति के झांसे में आ गए, जिसने अपनी बात व्यंग्यात्मक लहजे में कही थी। इतने वर्षों में पहली बार था कि मैंने उनको गलत ठहराया और संयोग यह रहा कि उनके साथ लगातार तीसरी बार यह घटना हुई।

उन्हें तसल्ली देकर मैंने समझाया कि इसमें उनके खिलाफ कुछ नहीं है और मेरी टिप्पणी तो उनके आइडिया पर थी। मैंने उन्हें चेतावनी भी दी कि यदि भविष्य में उन्होंने ‘क्रिटिकल इग्नोरिंग’ नहीं सीखी तो मैं उन्हें अपनी डिटॉक्सिफिकेशन कोचिंग क्लास में बुला लूंगा। यह विपश्यना जैसी है, जहां कोई लंबे समय तक मोबाइल नहीं रख सकता।

सोच रहे हैं कि ‘क्रिटिकल इग्नोरिंग’ क्या है? तो इसे मुंबई की जेन-जी से सीखिए। वो खुलकर कह रहे हैं कि बीते एक हफ्ते में उन्हें जो शॉर्ट वीडियो, रील्स और रीसाइकल्ड क्लिप्स मिल रहे हैं, वे राजनीतिक टिप्पणी के नाम पर परोसे जा रहे साम्प्रदायिक संदेशोंं, जातिगत कटाक्षों और महिला विरोधी ह्यूमर से भरे हैं।

उनका दावा है कि ये फीड्स युवाओं को इस महीने होने वाले मुंबई नगर निकाय चुनाव में जोड़ने के बजाय उन्हें दूर कर रहे हैं। तो ये युवा कैसे इससे बच रहे हैं? उन्होंने जानबूझकर अपने इंस्टाग्राम एल्गोरिदम को ऐसे कंटेंट से बचने के लिए प्रशिक्षित किया है। उनका दावा है कि अकसर धर्मांधता से भरे ये नकारात्मक फीड्स मनोरंजन के बजाय उन्हें परेशान करते हैं।

अब पहले पैराग्राफ में आए सीनियर प्रोफेशनल और दूसरे पैराग्राफ के युवाओं की सोच में फर्क देखिए। दूसरे समूह ने हमें सिखाया कि यह हम पर ही निर्भर करता है कि आक्रोश भड़काने वाले फॉरेवर केमिकल और किसी के लाभ के लिए फैलाई जा रही झूठी सूचनाओं की माइक्रोप्लास्टिक को अपने भीतर जाने से रोकें।

इंटरनेट पर घटिया और गलत जानकारी के इस दौर में क्या ऐसे तथाकथित ‘शुभचिंतक’ की भी आवश्यकता थी, जो किसी सहकर्मी के दिमाग में और जहर घोल दे? और उस दूसरे व्यक्ति को देखिए, जिसने वही नकारात्मकता मुझ तक पहुंचाने के लिए कॉल किया। उसे नहीं पता था कि मैं ‘क्रिटिकल इग्नोरिंग’ समझता हूं, जो 2026 में सभी कॉर्पोरेट प्रोफेशनल्स के लिए जरूरी स्किल है। यह ऐसी क्षमता है, जिसमें आप दिमाग को अविश्वसनीय नकारात्मक फीड्स और खराब डेटा को फिल्टर करने के लिए प्रशिक्षित करते हैं।

यह पूरी तरह से नजरअंदाज करना नहीं है। बल्कि शुरुआती संकेतों को परखने के बाद अनदेखा करने की कला है। ‘क्रिटिकल इग्नोरिंग’ शब्द 2021 में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के सैम वाइनबर्ग ने दिया था। उनका कहना है कि ‘यह हमारी अपनी कमजोरियों पर लगातार नजर रखने की प्रक्रिया है’।

याद रखिए कि मानव इतिहास का ज्यादातर हिस्सा बहुत कम जानकारी देता था। इसीलिए हमने उस उपलब्ध थोड़ी-सी जानकारी पर गहराई से काम करने की आदत विकसित कर ली। आज हम सूचनाओं की बाढ़ में हैं। चूंकि हम छोटी-सी सूचना की भी गहराई में जाने के आदी हो चुके हैं, इसलिए इंटरनेट और सोशल मीडिया पर परोसे जा रहे सारे जहर को निगले जा रहे हैं। इसके भी ऊपर हमारे कार्यस्थलों पर ‘जहरीले शुभचिंतक’ (शब्दों का यह कॉकटेल मैंने गढ़ा है) भी मौजूद हैं, जो इस साल हमें बेरोजगार करने पर तुले हैं।

फंडा यह है कि 2026 में हमारी सबसे बड़ी स्किल दोतरफा नकारात्मकता से निपटने की क्षमता होगी- एक ओर सोशल मीडिया और दूसरी ओर हमारे ‘जहरीले शुभचिंतक’। ‘क्रिटिकल इग्नोरिंग’ न सिर्फ हमारी नौकरी बचा सकती है, बल्कि पदोन्नति भी करा सकती है।

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