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क्या आपने कभी सोचा है कि जब आपका पांच साल का बच्चा सोने के समय पॉप्सिकल (आइस कैंडी) खाने की जिद पर अड़ जाए और न मिलने पर रोते हुए चिल्लाए कि ‘मैं आपसे प्यार नहीं करता’, तो एक माता-पिता के तौर पर आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या होगी? आम तौर पर लोग गुस्सा हो जाते हैं, डांटते हैं या बात को दबाने की कोशिश करते हैं। जबकि यही वह पल है, जहां आपकी ‘जिज्ञासा’ एक बेहतरीन पैरेंट्स के रूप में परीक्षा लेती है। दरअसल, जब बच्चा चिल्लाता है, तो उसका नर्वस सिस्टम भारी तनाव में मोबाइल के फ्लाइट मोड की तरह नेटवर्क से बाहर चला जाता है। तब उसे आपकी कोई बात सुनाई नहीं देती, न समझ आती है। ऐसे में उस पर गुस्सा करने या अनुशासन सिखाने के बजाय आपका शांत होकर पास बैठना, आपकी जिज्ञासा और आपका धैर्य ही सबसे ज्यादा काम आता है। पैरेंटिंग विशेषज्ञ और ए शार्प एंडलेस नीड की लेखिका मैक क्रेन बताती हैं कि पैरेंटिंग वास्तव में बच्चों पर नियंत्रण या ताकत दिखाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह हर रोज खुद को और बच्चों को गहराई से समझने की एक अंतहीन खोज है। मशहूर ऑस्ट्रियाई कवि रेनर मारिया रिल्के की पंक्तियों का हवाला देते हुए क्रेन बताती हैं कि बच्चों की परवरिश हमें ‘सवालों के साथ जीना’ सिखाती है। जब बच्चा किसी बात पर भड़कता है, तो हमें जासूस की तरह उसके पीछे छिपे कारणों को खोजना चाहिए। जैसे- क्या उसका स्कूल में दिन खराब रहा? दरअसल जब बच्चों के व्यवहार को अनुशासन के चश्मे से देखने के बजाय उनके भीतर की उथल-पुथल को समझने की कोशिश करते हैं, तो बच्चों में करुणा, गरिमा और सुरक्षा की भावना का विकास होता है। किसी बच्चे को दिया जाने वाला सबसे बड़ा तोहफा यही है कि उसे और उसकी भावनाओं को हर समय गंभीरता से लिया जाए। खुद के प्रति ईमानदार होकर ही बेहतर पैरेंट बनना संभव मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक, जो माता-पिता खुद को लेकर जिज्ञासु नहीं रहते, वे बच्चों के लिए भी एक अच्छा रोल मॉडल नहीं बन सकते। यदि आप अपनी कमियों, अपनी भावनाओं और अपनी बदलती सोच को लेकर सहज नहीं हैं, तो आप बच्चों के डर या उनके आनंद को सही ढंग से नहीं संभाल पाएंगे। पैरेंटिंग का अंतिम लक्ष्य बच्चों को आत्मनिर्भर बनाना है, लेकिन इस सफर में जिज्ञासा एक ऐसा पुल है जो माता-पिता और बच्चों के रिश्ते को उम्र के हर पड़ाव पर मजबूत और आदरपूर्ण बनाए रखता है।
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