4 घंटे पहले
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चेतन भगत, अंग्रेजी के उपन्यासकार
गुरुग्राम का उदय इसलिए हुआ था, क्योंकि नई दिल्ली अपनी रियल एस्टेट नीति में विफल रही थी। नई दिल्ली दुनिया के उन इने-गिने शहरों में से होगा, जिसने दशकों तक संगठित निजी रियल एस्टेट विकास को रोके रखा। उसकी भूमि और आवास का ज्यादातर कामकाज डीडीए के पास था, जो फ्लैट, शॉपिंग सेंटर और कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स बनाता था।
1990 और 2000 के दशक में उदारीकृत और आईटी की प्रधानता वाले भारत की मांग को पूरा करने के लिए ये डीडीए परियोजनाएं न तो पर्याप्त थीं, और ना ही गुणवत्तापूर्ण। भूमि एवं रियल एस्टेट की अप्रासंगिक नीति के कारण दिल्ली उन लोगों के लिए व्यावहारिक नहीं रही, जो ग्रेड-ए ऑफिस या बेहतर नियोजित व उच्च गुणवत्ता वाले आवासों की तलाश में थे।
इसी कमी के चलते यूपी में नोएडा और हरियाणा में गुरुग्राम का उदय हुआ। ये दोनों ही दिल्ली की सीमाओं से सटे हैं और दिल्ली में पूरी नहीं होने वाली जरूरतों को पूरा कर रहे हैं। गुरुग्राम और नोएडा- इन दोनों ने ही विकास किया, लेकिन गुरुग्राम आगे निकल गया। इसका बहुत अधिक श्रेय डीएलएफ डेवलपर को जाता है, जिसके जैसी योजना और नजरिया भारत में शायद ही कहीं देखने को मिले।
गुरुग्राम के निर्माण ए-ग्रेड के थे, कुछ ऐसा जो डीडीए फ्लैट्स से भरी दिल्ली ने कभी नहीं देखा था। दिल्ली के धनाढ्य महज एक ‘कोठी’ (छोटा बंगला) की उम्मीद कर सकते थे, लेकिन गुरुग्राम ने गोल्फ कोर्स, स्विमिंग पूल, हाई-स्पीड लिफ्ट और सेंट्रल एयर-कंडीशनिंग जैसी सुविधाएं दी।
शुरुआत में लोग गुरुग्राम में केवल रहने के लिए आए, लेकिन काम के लिए दिल्ली जाते थे। फिर आया गेम-चेंजर : ग्रेड-ए ऑफिस स्पेसेस- जो न केवल उत्तर भारत, बल्कि शायद समूचे भारत ने कभी नहीं देखे थे। मुंबई के विपरीत दिल्ली में नरीमन पॉइंट जैसा कुछ नहीं था।
अपने कुछ पुराने ऑफिस ब्लॉकों के साथ महज कनॉट प्लेस ही दिल्ली में सब कुछ था। दूसरी ओर, गुरुग्राम में चमचमाते ऑफिस, मॉल और रेस्तरां थे। इस खासियत के चलते यह बहुराष्ट्रीय कंपनियों, स्टार्टअप्स, कॉल सेंटर, मीडिया हाउस और चहलपहल भरी व्यावसायिक गतिविधियों का ठिकाना बना। नौकरियां और पैसा आए। मांग आसमान छूने लगी। जल्द ही दिल्ली के लोग भी कामकाज के लिए गुरुग्राम आने लगे।
यह तब की बात है जब दिल्ली-गुरुग्राम हाईवे भी नहीं था। ट्रैफिक जाम हर दिन की आम बात थी। लेकिन हाईवे शुरू होने के बाद भी गुरुग्राम का विस्तार इतना विस्फोटक था कि राजमार्ग पर भी अब हमेशा जाम ही रहता है। और अगर बारिश हो तो अराजकता छा जाती है।
पिछले हफ्ते ही सोशल मीडिया पर गुरुग्राम में मीलों तक फैले जाम के ड्रोन फुटेज की बाढ़ आ गई थी। कुछ यात्रियों ने छह घंटे तक फंसे रहने की शिकायत की। उन इलाकों तक की सड़कें डूब गई थीं, जहां बेहद महंगे अपार्टमेंटों में वरिष्ठ मैनेजर और बिजनेस लीडर रहते हैं।
भारत के सम्पदा-सृजन का प्रतीक शहर अचानक बदहाल दिखने लगा। यह भारतीयों को याद दिलाता है कि तुम विश्वस्तरीय जीवन का सपना देखने की हिमाकत मत करो, क्योंकि जल्द ही हकीकत से तुम्हारा सामना होगा। गुरुग्राम की समस्या ये है कि वह भारत के मानकों से बहुत बेहतर है।
भारत में अच्छी रिहाइश, ऑफिस, नौकरियों और मनोरंजन सुविधा वाले सुनियोजित शहरों की इतनी कमी है कि जब एक गुरुग्राम उभरता है तो पूरा देश उस पर टूट पड़ता है। यह शायद भारत के उन चार या पांच शहरों में से एक है, जहां 2 लाख रुपए प्रतिमाह से अधिक वेतन वाली नौकरियां बहुतायत में हैं।
इन चार-पांच महानगरों से बाहर कदम रखते ही कमाई और ए-ग्रेड की इमारतें तेजी से घट जाती हैं। इसमें छोटे कस्बों की बेरोजगारी को भी जोड़ दें, जिसके कारण युवा बड़े शहरों का रुख कर रहे हैं- तो आप गुरुग्राम की ओर खिंचे चले आएंगे।
यदि दिल्ली ने 1990 के दशक में एक समझदारी भरी रियल एस्टेट नीति बनाई होती तो गुरुग्राम कभी बनता ही नहीं। अगर भारत में शहरों को मास्टर प्लान के अनुसार सुनियोजित किया जाता तो कंपनियों को गुरुग्राम, बेंगलुरु, मुम्बई, हैदराबाद, चेन्नई से बाहर निकलने के लिए प्रोत्साहित किया जाता।
तब इन महानगरों के हालात इतने भयावह नहीं होते। आखिर सौ शीर्ष भारतीय कंपनियों में ऐसी कितनी हैं, जिनके मुख्यालय इन पांच शहरों से बाहर हैं? फिर इसकी तुलना अमेरिका से करें, जहां कॉर्पोरेट मुख्यालय दर्जनों शहरों में फैले हुए हैं।
आज हमारे पास यदि पांच ग्रेड-ए शहर हैं तो हमें पचास और चाहिए। तभी ग्रेड-ए कंपनियां और प्रतिभाएं इन चंद शहरों में सिमटने के बजाय बाहर निकल सकेंगी। नहीं तो हम गुरुग्राम की तरह अराजकता और ट्रैफिक जाम को सहते रहेंगे। (ये लेखक के अपने विचार हैं)








