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- Dr. Chandrakant Lahariya’s Column: Noise Pollution—A “Silent” Crisis That Is Constantly Taking Its Toll
12 घंटे पहले
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डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया, जाने माने चिकित्सक
साल 2012 में मुझे फ्रांस के प्रतिष्ठित पास्चर इंस्टीट्यूट में वैक्सीनोलॉजी का अध्ययन करने का अवसर मिला। वहां के कोर्स डायरेक्टर्स से मेरे अच्छे संबंध बन गए थे। कुछ वर्षों बाद जब वे भारत आए, तो मैंने उन्हें एक जाने-माने ‘फाइन डाइनिंग’ रेस्तरां में डिनर पर आमंत्रित किया। सब कुछ व्यवस्थित था-खाना, माहौल, सेवा- लेकिन एक चीज ने पूरे अनुभव को असहज बना दिया : शोर।
मेरे मेहमान बातचीत करने में असुविधा महसूस कर रहे थे। उसी दिन मुझे एहसास हुआ कि हम अपने आसपास शोर के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि उसकी समस्या पर गौर तक नहीं करते। आज भारत के शहरों में शोर केवल एक कोलाहल भरी पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि स्थायी वास्तविकता बन चुका है। सड़कों पर वाहनों के हॉर्न, अनवरत हो रहे निर्माण कार्यों की आवाज और सार्वजनिक स्थलों का अनियंत्रित ध्वनि स्तर- ये सब मिलकर ऐसा वातावरण बना रहे हैं, जो धीरे-धीरे हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है।
भारतीय शहर दुनिया के सबसे शोरगुल वाले शहरों में गिने जाते हैं। दिल्ली में शोर का औसत स्तर लगभग 75 डेसिबल तक पहुंच चुका है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन दिन के समय 55 डेसिबल की सीमा को सुरक्षित मानता है। मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु जैसे महानगरों में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है- अधिकांश क्षेत्रों में शोर का स्तर 65 से 75 डेसिबल के बीच रहता है और व्यस्त समय में यह 90 से 100 डेसिबल तक पहुंच जाता है।
चिंताजनक बात यह है कि हम मौसमी चुनौतियों- जैसे कि सर्दियों में वायु प्रदूषण, गर्मियों में जल संकट और हीट वेव, या ठंड के मौसम में कोल्ड वेव पर तो बात करते हैं- लेकिन ध्वनि प्रदूषण- जो साल भर रहता है- उस पर कम ध्यान दिया जाता है। जबकि लंबे समय तक 70 डेसिबल से अधिक शोर के सम्पर्क में रहने से हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।
हर 10 डेसिबल की वृद्धि के साथ हृदय संबंधी जोखिम लगभग 8 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। बच्चों में सीखने की क्षमता प्रभावित होती है, गर्भवती महिलाओं में जटिलताएं बढ़ती हैं और बुजुर्गों में नींद की समस्या आम हो जाती है। भारत में 6 करोड़ से अधिक लोग सुनने की समस्या से जूझ रहे हैं और ध्वनि प्रदूषण इसका एक बड़ा कारण बनता जा रहा है।
शोर का प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, यह हमारी उत्पादकता, मानसिक संतुलन और सामाजिक व्यवहार को भी प्रभावित करता है। लगातार शोर में रहने वाला व्यक्ति अधिक चिड़चिड़ा, थका हुआ और ध्यान केंद्रित करने में कम सक्षम होता है। ऐसे में समाज की समग्र कार्यक्षमता भी प्रभावित होती है। वैसे हमारे पास नियमों की कमी नहीं है।
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत ध्वनि प्रदूषण (नियमन एवं नियंत्रण) नियम बनाए गए थे। लेकिन समस्या नियमों की नहीं, उनके पालन की है। सड़कों पर अनावश्यक हॉर्न बजाना, देर रात तक डीजे या लाउडस्पीकर का उपयोग और निर्माण स्थलों पर समय-सीमा का उल्लंघन- ये सब आम हो चुके हैं। कानूनों का सख्त पालन सुनिश्चित करना होगा। जागरूकता बढ़ानी भी उतनी ही जरूरी है।
स्कूलों और कॉलेजों में संदेश देना होगा कि हॉर्न बजाना मजबूरी नहीं, आदत है- और इसे बदला जा सकता है। शहरी नियोजन में भी बदलाव जरूरी है। नॉइज़ बैरियर, ग्रीन कॉरिडोर और ईवी को बढ़ावा देना इस दिशा में सहायक हो सकते हैं। जिस तरह हम वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) को नियमित देखते हैं, उसी तरह शोर के स्तर की रियल-टाइम मॉनिटरिंग भी शुरू की जानी चाहिए। क्योंकि शोर प्रदूषण एक ऐसा साइलेंट संकट है- जो धीरे-धीरे हमें प्रभावित करता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)









