पार्कों,दफ्तरों और घरों में गूंजती है ‘रेडियो ताइसो’ की धुन:  सुबह 6.30 बजे पूरा जापान एक साथ कसरत करता है, 100 साल से यही सिस्टम
अअनुबंधित

पार्कों,दफ्तरों और घरों में गूंजती है ‘रेडियो ताइसो’ की धुन: सुबह 6.30 बजे पूरा जापान एक साथ कसरत करता है, 100 साल से यही सिस्टम

Spread the love




सुबह के ठीक 6:30 बजे हैं। जापान की राजधानी टोक्यो के किबा पार्क में हल्की धुंध है, लेकिन वहां सन्नाटा नहीं है। जैसे ही रेडियो पर पियानो की मधुर धुन गूंजती है, 88 साल की मीको कोबायाशी और उनके साथ खड़े सैकड़ों लोग एक साथ अपने हाथ हवा में लहराने लगते हैं। यह न तो सैन्य ड्रिल है और न ही कोई परेड। यह ‘रेडियो ताइसो’ की करीब 100 साल (1928) से जारी अभ्यास की परंपरा है। संभवत: इसी से जापान में दुनिया के सबसे सेहतमंद और दीर्घायु लोग हैं। सिर्फ 10 मिनट की कसरत रेडियो ताइसो ने 1928 में सुबह के समय सुमधुर संगीत के साथ सामूहिक योग-अभ्यास की परंपरा शुरू की थी। पूरा सत्र सिर्फ 10 मिनट का होता है। इसमें शरीर को स्ट्रेच करना, कमर घुमाना और हाथों को ऊपर-नीचे करने जैसे करीब 12 आसान स्टेप्स होते हैं। इसकी खूबसूरती यह है कि इसे बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक और ऑफिस जाने वाले कर्मचारी से लेकर व्हीलचेयर पर बैठे लोग तक, कोई भी कर सकता है। किसी जिम के उपकरण की जरूरत नहीं, बस रेडियो या मोबाइल पर धुन बजाते हैं और कसरत करते हैं। बचपन से रोजाना इस कसरत में शामिल हो रही मीको कोबायाशी कहती हैं, ‘अगर बारिश न हो, तो मैं रोज आती हूं। शरीर हिलता है तो अच्छा लगता है।’ दिखने में महज 60 के लगने वाले 83 वर्षीय केंजी इगुची बताते हैं कि यह कसरत उनके लिए सिर्फ जोड़ों के दर्द का इलाज नहीं है, बल्कि अपनों से मिलने का जरिया भी है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद इस पर प्रतिबंध भी लगा था जापान में 99,763 लोग ऐसे हैं, जिनकी उम्र 100 साल से अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि ‘रेडियो ताइसो’ बुजुर्गों को घर की चारदीवारी से बाहर निकालता है, जिससे वे मानसिक अवसाद और अकेलेपन से बचे रहते हैं और यह उनके दीर्घायु और सेहत का राज है। 1928 में इसकी शुरुआत की प्रेरणा अमेरिका के एक बीमा कार्यक्रम से मिली थी। सम्राट हिरोहितो के राज्याभिषेक के समय इसे जापान में लागू किया गया। दूसरे विश्व युद्ध में जापान की हार के बाद अमेरिका ने इसे ‘अधिनायकवादी’ अभ्यास बताते हुए प्रतिबंध लगा दिया था। 1951 में लोगों की मांग पर फिर शुरू किया गया। तब से यह लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बना हुआ है।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *