दुनिया मेरे आगे: जब बुद्धिमत्ता प्रकृति से टकराए, विकास की दौड़ में विनाश की आहट
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दुनिया मेरे आगे: जब बुद्धिमत्ता प्रकृति से टकराए, विकास की दौड़ में विनाश की आहट

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मनुष्य की बुद्धिमत्ता उसकी कल्पना से कहीं अधिक समृद्ध और गतिशील है, जितना कि हमें औपचारिक शैक्षणिक शिक्षा द्वारा विश्वास दिलाया गया है।’ प्रसिद्ध शिक्षाविद् सर केन राबिंसन के ये विचार हमें मनुष्य और उसकी बुद्धिमत्ता का बोध कराते हैं। मनुष्य को सभी जीवों में क्यों उच्चतम जीव माना गया है? यहां तक कि उसका जीवन एक वरदान के समान क्यों है? इन सब बातों का जवाब इस एक कथन से साफ हो जाता है।

दरअसल, मनुष्य की बौद्धिक क्षमताएं असीम है। हालांकि, दूसरे जीवों में भी यह पहलू मौजूद है, लेकिन वह एक दायरे में सिमटा हुआ है। मनुष्य के मामले में यह बिल्कुल अलग है। मनुष्य की बुद्धिमत्ता अपार है, उसकी जिज्ञासा अटल है, जिसके कारण उसके पास अनंत संभावनाओं तक पहुंचने और प्रकृति को अपनी स्थिति के अनुकूल बनाने का बल है। मनुष्य का बाकी जीवों की तुलना में ज्यादा विकास हुआ है। यह उसकी बौद्धिक क्षमता का प्रमाण ही है कि वह आज इतना काबिल हो गया कि उसने कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी अद्भुत तकनीकों का निर्माण किया है। मनुष्य ने अपनी प्रतिभा के जरिए नवाचारों को जन्म देकर इसे मुमकिन कर दिखाया और लगभग हर क्षेत्र में विजय हासिल कर रहा है।

इन सब उपलब्धियों की वजह से मनुष्य अपनी बुद्धिमत्ता की छवि देख सकता है और अपने विकास के पीछे का कारण जान सकता है। मगर यह भी जानने की जरूरत है कि अपने विकास के साथ प्रकृति और उसके आयामों का कितना विकास हुआ, उसकी बुद्धिमत्ता से प्रकृति को कितना लाभ और उस पर कितना असर पड़ा। आखिर उसकी बुद्धिमत्ता का सृजन प्रकृति से ही हुआ है। इसी संदर्भ में बात की जाए तो मनुष्य अपने विकास के दौरान प्रकृति, उसके आयामों और यहां तक कि उसके द्वारा दुनिया में कायम संतुलन को खुद ही असंतुलित कर रहा है। आज जिस स्तर पर बाढ़, भूकम्प और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक विपदाएं सामने आ रही है, वह कई बार चिंता पैदा करती है। लगभग एक सदी पहले इस स्तर पर न कोई विपदा देखी जाती थी और न ही कोई इसकी कल्पना करता था। पिछले कुछ सालों में मनुष्य ने जिस अनैतिक तरीके से प्रकृति का दोहन किया, उन्हीं कर्मों का फल ये विपदाएं हैं।

मनुष्य को यहां एक और बात समझने की जरूरत है। वह बुद्धिमान जीव है और गतिशील जीव भी। इसमें कोई दोराय नहीं है, लेकिन यह देखने की जरूरत है कि उसकी बौद्धिक क्षमताएं कितनी मुसीबतों को निमंत्रण दे रही हैं। एक अध्ययन के अनुसार, मानव गतिविधियों ने पृथ्वी को हद से ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। उसे ऐसी विकट परिस्थिति में धकेल दिया है, जहां वैज्ञानिकों द्वारा रेखांकित नौ पारिस्थितिकी सीमाओं में से चार उसके द्वारा पहले ही पार कर ली गई हैं। इसमें जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता की हानि, भूमि उपयोग में परिवर्तन और नाइट्रोजन व फास्फोरस चक्रों में असंतुलन शामिल हैं। इन सीमाओं को पार करने से पृथ्वी की स्थिरता प्रभावित हो रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन परिवर्तनों में जलवायु परिवर्तन पार की गई सबसे गंभीर सीमा है, क्योंकि वायुमंडल में कार्बन डाइआक्साइड का स्तर 350 भाग प्रति मिलियन से बढ़कर 395 भाग प्रति मिलियन हो गया है। यह स्थिति पृथ्वी की प्रणाली में अचानक परिवर्तनों का कारण बन सकती है। जैसे कि आर्कटिक बर्फ की चादरों का पिघलना, जो और अधिक ग्रीनहाउस गैसों को मुक्त कर सकता है।

मनुष्य ऊर्जा का भंडार है। वह उर्जा, जिसके बिना प्रकृति अधूरी है। लेकिन यहां प्रकृति मनुष्य से उसके हित और विस्तार की उपेक्षा करती है, न कि विध्वंस का। आज मनुष्य अपनी ऊर्जा का प्रयोग अपने हित के लिए कर रहा है। हालांकि पहले भी मनुष्य अपनी प्रतिभा का प्रयोग अपने लाभ के लिए करता आया है, लेकिन यहां फर्क बस इतना है कि पहले मनुष्य प्रकृति के साथ साझेदारी बनाकर अपना विकास करता था, जो आज प्रभुत्व से बदल गया है। हाल ही में हैदराबाद के कांचा गाचीबोवली में आइटी पार्क के निर्माण के चलते लगभग दो वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के जंगल और वनस्पतियों को नष्ट कर दिया गया। यह उदाहरण असल में मनुष्य का स्वार्थ साबित करता है, जहां वह सिर्फ अपने हित के लिए कार्य करना चाहता है और उसे प्रकृति से कुछ लेना-देना नहीं है।

मनुष्य की बुद्धिमत्ता ने उसे विकास की नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। मगर जब यही बुद्धिमत्ता प्रकृति के विरुद्ध खड़ी हो जाएं, तब मनुष्य का विनाश तय है। अगर मनुष्य अपना कल्याण चाहता है, तो उसे यह बात समझने की आवश्यकता है कि असली बुद्धिमत्ता वही है, जो सृजन करे, न कि विनाश। प्रकृति और मानव के बीच का संतुलन ही स्थायी विकास की कुंजी है। आज यह जरूरत है कि मनुष्य अपनी बुद्धिमत्ता को जिम्मेदारी से जोड़े, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस धरती को उतना ही सुंदर और जीवनदायी पाएं, जितना उसे विरासत में मिला है।
मनुष्य की बुद्धिमत्ता उसे बाकी जीवों से अलग बनाती है, क्योंकि वह प्रकृति को अन्य जीवों से ज्यादा समझ पाया है। यही वजह है कि मनुष्य प्रकृति के संसाधनों का ज्यादा उपयोग कर पाया। आज यह मनुष्य की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वह प्रकृति का सम्मान करे। चूंकि उसकी बुद्धिमत्ता प्रकृति की देन है, इसलिए उसे प्रकृति का ऋणी होना चाहिए। मनुष्य और उसकी बुद्धिमत्ता का परिचय सतत् विकास के साथ हो, यही उसका प्रयास होना चाहिए। आखिर उसकी भलाई इसी बात में निहित है।





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