नवनीत गुर्जर का कॉलम:  गजब की ठण्ड है इन दिनों- जी राम जी!
टिपण्णी

नवनीत गुर्जर का कॉलम: गजब की ठण्ड है इन दिनों- जी राम जी!

Spread the love


6 घंटे पहले

  • कॉपी लिंक
नवनीत गुर्जर - Dainik Bhaskar

नवनीत गुर्जर

ठण्ड लटालूम! पहले नियम-कायदों ने उड़ानें रोक रखी थीं। अब ठण्ड उड़ानें रद्द या लेट करवा रही है। सूरज के बारहों रूप मद्धम पड़ गए हैं। घरों के हाल सुख-दु:ख की धूप-छांह से हैं। पहले धूप का एक टुकड़ा जिस खिड़की से आता है, उसी से लौटकर खिड़की के कांच पर चढ़ जाता है।

कुछ देर वहीं से घर का मुआयना करने के बाद ठिठुरे हुए पक्षी की तरह आंगन या लॉन के एक कोने में दुबक जाता है। दोपहर जैसा कुछ होता नहीं। क्योंकि छितराई धूप पर भी हर वक्त बादलों का पहरा रहता है। बैरन शाम, धूप के उस टुकड़े को उठाकर आम के पेड़ पर टांग देती है और वह वहीं लटके-लटके दम तोड़ देता है।

उम्मीदों की हर सुबह धूप का वह टुकड़ा फिर जन्मता है और फिर से मर भी जाता है। हमारी उम्र के हर रोज की तरह।

उधर ठण्डी की इस बयार में लोग दांत कड़कड़ाने से बचे रहें, इसलिए सरकार ने मनरेगा का नाम बदलकर ‘जी राम जी’ कर दिया है। आखिर जो भूले-बिसरे भी राम का नाम नहीं ले पाते, उनकी जुबान पर राम नाम तो आएगा। वृंदावन वाले प्रेमानंद महाराज भी कहते हैं नाम जपो। सब ठीक होगा। सरकार भी यही कर रही है।

दूसरी तरफ हमेशा की तरह एक चौंकाने वाली नियुक्ति हुई। कार्यवाहक ही सही, नितिन नवीन के रूप में भाजपा को अपना नया अध्यक्ष मिल गया। जेपी नड्डा भी इसी तरह पहले कार्यवाहक बनाए गए थे। बाद में अध्यक्ष हो गए। महीनों से नए भाजपा अध्यक्ष के नाम के कयास लगाए जा रहे थे। लेकिन हुआ वही, जो पिछले 11-12 साल से होता आया है। एक नया ही नाम सामने आया।

दरअसल, जब से केंद्र में मोदी सरकार आई है, मीडिया के सूत्र और विश्वस्त सूत्रों के मुंह पर कोई हल्दी फेर गया है। उस मीडिया के मुंह पर भी, जो हमेशा सत्ता के इर्द-गिर्द मंडराता फिरता है और दावा भी करता रहता है कि उनके, उनसे करीब कोई नहीं है।

खैर, शादियों का मौसम है और सोने में जाने कैसी आग लगी है कि वो निखरता ही जा रहा है। शादियों में सोना-चांदी इसलिए खरीदा जाता है कि सोने जैसा मन रहे और चांदी जैसा तन। हालांकि मन या तन से इनका ज्यादा कुछ ताल्लुक रहता नहीं है।

कहते हैं- जिस तरह गन्ने में फूल नहीं होते, चंदन में फल नहीं होते, वैसे ही सोने में सुगंध नहीं होती। लेकिन नूर और नखरों के चक्कर में सब सोने के पीछे पड़े रहते हैं। ‘एक नूर, नूर, हजार नूर कपड़े, लाख नूर जेवर, करोड़ नूर नखरे’।

हां, सोने से याद आया- किसी का सवाल। सवाल ये था कि लंका तो हनुमान जला आए थे, फिर राजतिलक में विभीषण को राम ने कौन-सी लंका सौंपी? जली-जलाई या मरम्मत की हुई? सवाल जितना टेढ़ा है, जवाब उतना ही आसान… कि ताप पाकर सोना जलता नहीं, उसमें और भी निखार आता है!

सोने की क्या कहें- जैसे सोते वक्त आदमी “भावशून्य’ हो जाता है, वैसे ही सोने के “भाव’ भी आम आदमी के लिए ज्यादा मायने नहीं रखते। खरीदना हो तो कितना ही महंगा हो खरीद ही लेता है। …और न खरीदना हो तो सस्ता होने पर भी महंगा ही लगता है। भाव यहां भी शून्य! फिर भी सामाजिक प्रतिष्ठा या विवाद की बड़ी जड़ सोना ही होता है।

“फ्रीडम एट मिडनाइट’ से आज तक सोना बड़ा सोणा है। लेरी कॉलिन्स और डोमिनिक लेपियरे की यह किताब कई वजहों से विवाद में आई। उनमें एक सोना भी था। सोने का सिंहासन। इसमें कहा गया कि उड़ीसा के महाराजा की शैय्या सोने की है और उसकी बनावट ब्रिटिश महारानी के सिंहासन से मिलती-जुलती है। हो गया विवाद!

कुल मिलाकर सोना हों या चांदी, कपड़े हों या जेवर सबकुछ बाजार और चुम्बक का खेल है। फणीश्वरनाथ रेणु के “मैला आंचल’ से लेकर श्रीलाल शुक्ल के “राग दरबारी’ तक ज्यादातर गांव और कस्बे तो अभी भी वैसे ही हैं, लेकिन शहरों में अर्थव्यवस्था ने बाजार को चुम्बक और आदमी को लोहा बना दिया है। खिंचा जा रहा है बाजार की तरफ। धीरे-धीरे हवा गांवों की तरफ भी बह रही है।

बाजार और बिक्री के इस दौर में आदमी भी भरपूर कीमत में बिक रहा है। इन दिनों आईपीएल के ऑक्शन चल रहे हैं। खिलाड़ी बिक रहे हैं। उन्हें करोड़ों में खरीदा जा रहा है। कोई दो करोड़, कोई चार और कोई पच्चीस करोड़ में।

कीमत याद रखनी इसलिए जरूरी है क्योंकि जब ये आईपीएल मैचों में चौके-छक्के लगाएंगे या विकेट लेंगे, तब हिसाब लगाने में सहूलियत रहेगी कि इनका एक चौका कंपनी को कितने में पड़ा। एक छक्का कितने हजार या लाख का रहा या एक विकेट के लिए कितनी रकम चुकानी पड़ी? बहरहाल, ठण्ड सुहानी है। सुबह और देर शाम तो लगता है, जैसे कहीं कोई धूप का टुकड़ा मिल जाए तो इससे अच्छा कुछ नहीं!

कि चलो इसी बहाने जुबान पर राम नाम तो आएगा… ठण्डी की इस बयार में लोग दांत कड़कड़ाने से बचे रहें, इसलिए सरकार ने मनरेगा का नाम बदलकर ‘जी राम जी’ कर दिया है। आखिर जो भूले-बिसरे भी राम का नाम नहीं ले पाते, उनकी जुबान पर राम नाम तो आएगा।

खबरें और भी हैं…



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *