8 घंटे पहले
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नवनीत गुर्जर
फरवरी-मार्च 2027 में पांच राज्यों में चुनाव हैं- उत्तरप्रदेश, उत्तराखण्ड, पंजाब, गोवा और मणिपुर। फिर वही चुनावी वादों, वही घोषणाओं और लुभावने तीर-तरकश की बारी आने वाली है! दरअसल, चुनावी वादे समय की पगडण्डी की तरह होते हैं। प्रचार का वक्त गुजरने के बाद उस पर इतनी घास-फूस उग आती है कि वादों के पदचिह्न भी नजर नहीं आते! सेवा के लिए नहीं, चुनाव जीतने भर के लिए प्रत्याशी हमसे लुभावने वादे करते हैं और हम मान भी लेते हैं।
नेताओं को देखते ही हमारे होंठों पर कई किंतु-परंतु आ जाते हैं। लेकिन हम उन्हें सवाल में परिवर्तित करने के बजाय अपने हाथों से पोंछ देते हैं। इस भ्रम के साथ कि जीभ तो केवल हुकूमत की होती है, इंसान तो जाने कब से चुप है! बात उन युवाओं की है, जो आजकल जेन-जी की श्रेणी में गिने जा रहे हैं और काफी पॉपुलर भी हैं। कभी जंतर-मंतर के जरिए, कभी रामलीला मैदान के मार्फत, तो कभी अपनी गिरफ्तारियों के कारण।
सरकारों को इन जेन-जी के आंदोलन या उनके गुस्से का कोई तोड़ नजर नहीं आ रहा। वैसे भी बुजुर्गों से भरी पड़ी सरकारों में युवाओं के मुद्दों और मसलों को समझने का गुर कम ही होता है। युवा हैं कि मानने को तैयार नहीं हैं।
सही है, ये उम्र ही ऐसी होती है कि इसमें अब तक का देखा-परखा सबकुछ अजीब लगने लगता है। अगल-बगल और दूर-पास का सबकुछ अजनबी लगता है। समाज, सरकार और परिवार की तमाम बंदिशों और मनाहियों को किसी जलते चूल्हे में फेंक देने को मन करता है। आकाश में दिखते तारों- जिन्हें हम सप्तर्षि कहते हैं और जिन्हें दूर से ही प्रणाम करना होता है- के पास जाकर उन्हें छूने को मन करता है।
दरअसल, कोई युवा मन सब्र-संतोष की जिंदगी कभी नहीं चाहता। युवावस्था का तो सच ही यही है कि उसने समाधि के चैन का वरदान नहीं, भटकन की बेचैनी का शाप पाया होता है! ऐसी अवस्था में जब कपड़ों की तरह इर्द-गिर्द का सबकुछ तंग लगने लगता है, तब हम किसी व्यवस्था, किसी सरकार की दकियानूसी चीजों को आखिर बर्दाश्त क्यों करें?
और कब तक करें? दुनिया के किसी भी कोने में अन्याय होते देख जिनकी सांसों में आग सुलगने न लग जाए वो युवा ही कैसा? वो युवावस्था ही कैसी? वैसे फिलहाल जेन-जी के तमाम मुद्दों को कांग्रेस और उसके समर्थक राजनीतिक दल भुनाने में लगे हुए हैं।
जिस तरह आजादी के तुरंत बाद समाजवादियों के तमाम नारे कांग्रेस ने चुरा लिए थे और कहा था कि हम टुकड़ों में बंटे हुए समाज को ठोंक-पीटकर इकट्ठा कर रहे हैं और वोट की खातिर बाद में उन्हीं जातियों या जातिवादी समूह को एक-एक कर के बिखेर दिया गया था, उसी तरह अब भी हो रहा है। राहुल गांधी को लग रहा है कि वे जेन-जी के अगुआ होकर उभरे हैं।
कांग्रेस को लग रहा है कि यही वो अवसर है, जिसमें वह जेन-जी के सहारे अपनी नैया पार लगा सकती है। हो सकता है ऐसा हो भी, लेकिन दिल्ली अभी बहुत दूर है यानी लोकसभा चुनाव में अभी बहुत वक्त है!
जिन पांच राज्यों में चुनाव अभी होने हैं, वहां अगर जेन-जी का प्रभाव काम कर गया तो निश्चित ही सत्ताओं को पलटने में देर नहीं लगेगी। ये बात और है कि जो आंदोलनरत युवा हैं, वे और घर बैठे जो युवा उनका समर्थन कर रहे हैं, वे वोट में किस हद तक कन्वर्ट होते हैं या उनमें से कितने पोलिंग बूथ तक पहुंच पाते हैं?
बहरहाल, आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई है! कांग्रेस वोट चोरी का आरोप लगाकर लोगों को अपने पक्ष में करना चाहती है, जबकि पहली बार सत्ता पक्ष या कह सकते हैं कि ज्यादातर राज्य सरकारें और केंद्र सरकार भी देश में विपक्ष के खिलाफ प्रदर्शन करने को उतारू है।
कर भी रही हैं! आम आदमी के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष की तरफ से होने वाले या हो रहे ये विरोध-प्रदर्शन एक तरह का तमाशा ही हैं।
ऐसे में याद आते हैं ख्यातनाम शायर राहत इंदौरी… : झूठों ने झूठों से कहा है, सच बोलो… सरकारी ऐलान हुआ है, सच बोलो…! घर के अंदर झूठों की एक मंडी है, दरवाजे पर लिखा हुआ है, सच बोलो…!
वादों-घोषणाओं की बारी… फिर उन्हीं चुनावी वादों, घोषणाओं, लुभावने तीर-तरकश की बारी आने वाली है। चुनावी वादे समय की पगडण्डी की तरह होते हैं। प्रचार का वक्त गुजरने के बाद उस पर इतनी घास-फूस उग आती है कि वादों के पदचिह्न भी नजर नहीं आते! सेवा के लिए नहीं, चुनाव जीतने भर के लिए प्रत्याशी हमसे लुभावने वादे करते हैं और हम उन्हें मान भी लेते हैं।








