टिपण्णी

पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: योग और विज्ञान का संयुक्त जीवन जीना ही बुद्धिमानी है

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महाभारत में अर्जुन ने अपने रथ की रास श्रीकृष्ण के हाथ में देकर अपने को सुरक्षित कर लिया और विजयी भी इसी कारण से हुए। अर्जुन सौभाग्यशाली थे कि उनको ईश्वर दिख रहे थे, लेकिन हमें दिखेंगे नहीं। फिर भी हमारी लाइफ का स्टीयरिंग ईश्वर के हाथ में है। पिछले दिनों विदेश यात्रा में मुझे टेस्ला की बिना ड्राइवर की एक गाड़ी में बैठने का अनुभव हुआ तो अर्जुन याद आ गया। कौन चला रहा है, दिख नहीं रहा। बड़ा सुविधाजनक रोमांच था। अज्ञात भय भी था। लेकिन मैं जहां से चला, लौटकर वहां सुरक्षित भी आ गया। तकनीक के प्रति मुझे सम्मान देना था। लेकिन यहां मैं आध्यात्मिक रूप से सोचता रहा कि यही जीवन का सच है। हमें जीवन की गाड़ी का चालक दिख नहीं रहा, पर वो है। यह ईश्वर की अनुभूति है। अब तकनीक तो इतनी आगे निकल गई है और मनुष्य के शरीर पर इतने प्रयोग हो रहे हैं कि यदि इस शरीर में शांति से रहना है तो आत्मा की अनुभूति करनी पड़ेगी। और उसका माध्यम योग है। योग और विज्ञान का संयुक्त जीवन जीना ही अब बुद्धिमानी होगी।



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