3 दिन पहले
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आज (22 सितंबर) देवी पूजा के उत्सव नवरात्रि का पहला दिन है। नवरात्रि में देवी के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। भक्त देवी के शक्तिपीठों में दर्शन-पूजन करने पहुंचते हैं। सभी शक्तिपीठ देवी सती से ही संबंधित हैं। जिस तरह देवी दुर्गा के नौ स्वरूप हैं, ठीक उसी तरह देवी सती की दस महाविद्याएं हैं। महाविद्याओं की साधनाएं मुश्किल होती हैं, इसलिए इन्हें सामान्य लोग नहीं करते हैं। ये साधनाएं विशेषज्ञ साधकों के मार्गदर्शन में करने की सलाह दी जाती है। आमतौर पर तंत्र-मंत्र से जुड़े लोग ही दस महाविद्याओं की साधना करते हैं।
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, दस महाविद्याओं में काली, तारा, त्रिपुरा सुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुरा भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और देवी कमला शामिल हैं। इन दस महाविद्याओं के तीन अलग-अलग समूह हैं। पहले समूह में सौम्य स्वभाव महाविद्याएं त्रिपुरा सुंदरी, भुवनेश्वरी, मातंगी, कमला हैं। दूसरे समूह में उग्र स्वभाव की काली, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी माता शामिल हैं। तीसरे समूह में सौम्य-उग्र स्वभाव की तारा और त्रिपुरा भैरवी शामिल हैं।
अब जानिए कैसे प्रकट हुईं दस महाविद्याएं
- दस महाविद्याओं की कथा देवी सती से जुड़ी हुई है। देवी सती ने भगवान शिव से विवाह किया था, लेकिन देवी के पिता दक्ष प्रजापति इस विवाह से खुश नहीं थे। दक्ष शिव को पसंद नहीं करते थे। वे अक्सर शिव का अपमान करने के मौके तलाशते रहते थे।
- एक बार दक्ष ने एक बड़ा यज्ञ आयोजित किया, उसमें सभी देवताओं और ऋषियों को आमंत्रित किया, लेकिन जानबूझकर शिव और सती को नहीं बुलाया। जब सती को इस यज्ञ की जानकारी मिली, तो उन्होंने अपने पिता के घर जाने की इच्छा शिव जी को बताई। शिव जी ने उन्हें समझाया कि बिना बुलावे वहां जाना ठीक नहीं होगा, क्योंकि यह सम्मान का विषय है।
- सती ने कहा कि पिता के घर जाने के लिए निमंत्रण की आवश्यकता नहीं होती। शिव ने कई बार उन्हें रोका, परंतु सती अपनी बात पर अडिग रहीं। बार-बार रोके जाने पर सती को बहुत क्रोध आ गया।
- क्रोध में आकर देवी का रूप विकराल हो गया और उनके भीतर से दस दिशाओं में दस शक्तियां प्रकट हुईं। ये थीं—
- काली, तारा, त्रिपुरा सुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुरा भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला।
- ये सभी देवी के ही दस अलग-अलग रूप थे, जिन्हें दस महाविद्याएं कहा जाता है।
- इन रूपों को देखकर शिव भी चकित रह गए और देवी से उनके बारे में पूछा। तब देवी ने बताया कि ये दस रूप उनके विभिन्न शक्तिस्वरूप हैं। इसके बाद शिव जी ने देवी का रास्ता छोड़ दिया और देवी सती पिता दक्ष के यज्ञ में पहुंच गईं।
- देवी सती को देखते ही दक्ष ने शिव के बारे में अपमानजनक बातें कह दीं। अपने पति का अपमान सती सहन नहीं कर सकीं और उन्होंने वहीं यज्ञ कुंड में योग अग्नि के द्वारा अपने शरीर का त्याग कर दिया।
- इस घटना के बाद शिव जी बहुत क्रोधित हो गए और उन्होंने वीरभद्र को उत्पन्न करके यज्ञ को विध्वंस करवा दिया और दक्ष का सिर काट दिया। बाद में शिव ने दक्ष को क्षमा कर दिया और उसे जीवनदान भी दिया।
- पुनर्जन्म में देवी सती ने हिमालय राज के यहां पार्वती के रूप में जन्म लिया। वर्षों तपस्या करने के बाद उन्होंने फिर से भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया।








