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- Neeraj Kaushal’s Column What Should Be The Cost Of Earning Money In America?
7 घंटे पहले
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नीरज कौशल, कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर
डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा अमेरिका में अवैध रूप से प्रवेश करने वाले सैकड़ों प्रवासियों को डिपोर्ट करने के बाद से सोशल मीडिया में ‘डंकी-माइग्रेशन’ की खूब खबर ली जा रही है। डंकी प्रवासियों के बारे में आम तौर पर कहा जाता है कि वे भोले-भाले युवा हैं, जिन्हें दुनिया के सबसे खतरनाक और अपराध-ग्रस्त इलाकों से होकर अमीर देशों की बेहद जोखिम भरी यात्रा के लिए झांसा देकर राजी कर लिया जाता है।
इसके लिए एजेंट्स उनसे 40 से 60 लाख रुपए तक वसूलते हैं। यह अमेरिका के लिए एक सामान्य हवाई टिकट से 40 से 60 गुना अधिक रकम है। यकीनन, इतनी बड़ी राशि के निवेश के इससे बेहतर तरीके होने चाहिए। और इसके बावजूद जो हजारों प्रवासी डंकी-रूट चुनते हैं, वो ऐसा नहीं सोचते।
यदि वे सुरक्षित रूप से अमेरिका पहुंच जाने में सफल होते हैं और उन्हें डिपोर्ट नहीं किया जाता है (जो कि ट्रम्प के अमेरिका में बहुत मुश्किल है) तो गणित उनके पक्ष में भी काम करता है। मैंने पिछले सप्ताह इस बात को महसूस किया।
बीते सप्ताह दो बार मुझे न्यूयॉर्क में ऐसे भारतीय प्रवासियों की टैक्सियों में यात्रा करने का मौका मिला, जिन्होंने खुद स्वीकार किया कि वे डंकी-रूट से अमेरिका आए थे। जब मैंने उन्हें नासमझ कहा तो वे चौंक गए। उलटे उन्होंने डंकी-माइग्रेशन के प्रति मेरी बेरुखी को कमअक्ली समझा। उन्हें नहीं लगता था कि उनके साथ फरेब हुआ है। उन्होंने इस तरीके से अमेरिका आने में हुए खर्च को ‘इंवेस्टमेंट’ करार दिया।
अमेरिका में ढाई साल से रह रहे सतिंदर ने कहा कि उन्होंने इस अवधि में अपनी यात्रा की पूरी लागत को कवर करने के लिए बचत की है। अब वे उस येलो-कैब के मालिक हैं, जिसमें हम सवार थे। उनके पास एक टैक्सी मेडलियन भी है।
यह एक हस्तांतरणीय परमिट होता है, जो कि न्यूयॉर्क सिटी में टैक्सी चलाने की अनुमति देता है। उन्होंने कहा कि टैक्सी और मेडलियन खरीदने के लिए उनके परिवार और दोस्तों ने उनकी 200,000 डॉलर (लगभग 1.6 करोड़ रुपए) की मदद की है। अंत में उन्होंने बहुत विश्वास से कहा कि अगर संयुक्त राज्य अमेरिका में आप कड़ी मेहनत करने के लिए तैयार हैं तो आप कितनी दूर तक जा सकते हैं, इसकी कोई सीमा ही नहीं है।
दूसरी टैक्सी के ड्राइवर- जिनका नाम कपिल देव था- की कहानी सतिंदर की तुलना में थोड़ी कम शानदार थी। लेकिन उन्हें भी यही लगता था कि उन्होंने एक सार्थक निवेश किया है और दो से तीन साल के भीतर वे अपनी यात्रा की लागत वसूलने में कामयाब हो जाएंगे। वे बहुत अच्छी अंग्रेजी नहीं बोल पाते थे। उनकी योजना अमेरिका में 5 साल तक काम करने, बहुत सारा पैसा कमाने और फिर भारत लौट जाने की है।
जनवरी से अब तक अमेरिका से निकाले गए करीब 400 भारतीय नागरिकों के लिए अवैध प्रवास भले एक हादसा बन चुका हो, लेकिन हजारों अन्य के लिए ऐसा नहीं है। यह भावना बढ़ रही है- और शाहरुख खान की फिल्म ‘डंकी’ का भी इसमें कुछ हद तक योगदान है- कि डंकी-रूट का उपयोग करने वाले भारत के प्रति देशभक्त नहीं हैं।
फिल्म में शाहरुख द्वारा निभाया गया हार्डी का किरदार ब्रिटेन में रहने के प्रस्ताव को यह जताने के लिए अस्वीकार कर देता है कि वह एक सच्चा देशभक्त है। इस तर्क के मुताबिक उनके साथी प्रवासी- जिन्होंने विदेश में रहने का चयन किया था- देशभक्त नहीं थे। जबकि डंकी प्रवासियों के देशभक्त होने या न होने का कोई सवाल ही नहीं है।
वे केवल उद्यमी युवा हैं और रोजी-रोटी की तलाश कर रहे होते हैं। वो माइग्रेशन का जो विकल्प चुनते हैं, वह बहुत जोखिम भरा होता है। हम नहीं जानते कि डंकी-रूट अपनाने वाले कितने भारतीय वास्तव में सफल हो पाते हैं। लेकिन हम यह जरूर जानते हैं कि देश में हजारों लोग इन प्रवासियों की सफलता से मंत्रमुग्ध हैं और इसी तरह का जोखिम उठाने के लिए तैयार हैं।
डोनाल्ड ट्रम्प अवैध अप्रवासियों को अपराधी मानते हैं। वे उन्हें बेड़ियों में जकड़कर या तो अपने देश वापस भेज दे रहे हैं या अमेरिका, ग्वांतानामो या एल सल्वाडोर में ऐसी कुख्यात जेलों में कैद कर रहे हैं, जहां दुर्दांत अपराधियों को रखा जाता है।
अभी तक तो उनकी नीति कारगर रही है, क्योंकि दक्षिणी सीमा से प्रवेश करने वाले अवैध प्रवासियों की संख्या में खासी गिरावट आई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या उनकी सरकार मध्यम और लो-स्किल्ड श्रमिकों की मांग को पूरा करने के लिए माइग्रेशन के वैध तरीकों को बढ़ाएगी? अमेरिका में अनियमित प्रवासन ने अतीत में इस मांग को पूरा किया था। अगर नहीं, तो अवैध इमिग्रेशन को बढ़ावा देने वाले हालात ही पनपेंगे।
हम नहीं जानते कि डंकी-रूट अपनाने वाले कितने भारतीय वास्तव में सफल हो पाते हैं। लेकिन हम यह जरूर जानते हैं कि देश में हजारों लोग इन प्रवासियों की सफलता से मंत्रमुग्ध हैं और इसी तरह का जोखिम उठाने के लिए तैयार हैं।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं।)








