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4 घंटे पहले
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आरती जेरथ राजनीतिक टिप्पणीकार
बिहार में होने वाली चुनावी जंग ने जाति जनगणना की घोषणा के साथ एक दिलचस्प मोड़ ले लिया है। सरकार ने इस फैसले से एक तीर से दो निशाने साधे हैं। इसका स्पष्ट उद्देश्य तो विपक्षी दलों से उनका मुख्य चुनावी मुद्दा हड़प लेना है।
कारण, तेजस्वी यादव और राहुल गांधी- दोनों ही जाति जनगणना के लिए आवाज बुलंद करने में सबसे आगे रहे हैं। लेकिन एक और फैक्टर ऐसा भी है, जो ऊपर से नजर नहीं आता। यह है बिहार में नीतीश कुमार पर दशकों से चली आ रही निर्भरता से खुद को मुक्त करने और अपने किसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाने का भाजपा का संकल्प।
जातिगत पुनर्मूल्यांकन की घोषणा भाजपा द्वारा नीतीश के निष्ठावान ईबीसी (अति पिछड़ी जातियां) वोटों में सेंध लगाने का साहसिक कदम है। ईबीसी राज्य की आबादी का लगभग 36% हैं। भाजपा इनकी मदद से बिहार में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरना चाहती है।
इसके बाद अब बिहार के चुनावों में रोमांचक मुकाबला देखने को मिल सकता है, क्योंकि नीतीश के गिरते स्वास्थ्य की पृष्ठभूमि में ओबीसी-ईबीसी वोटों के लिए होड़ मची हुई है। सबसे वंचित गैर-दलित जातियों में से लगभग 113 ईबीसी-समूह नीतीश की राजनीति के केंद्रबिंदु रहे हैं।
हालांकि नीतीश में लालू यादव जैसा करिश्मा नहीं था, लेकिन वे पिछले दो दशकों से चुनावी नतीजों को प्रभावित देने वाले चतुर जातिगत समीकरणों के चलते राजद को सफलतापूर्वक मात देते आ रहे थे। एनडीए के साथ रहते हुए उनके ईबीसी जनाधार और भाजपा को वोट देने वाली उच्च जातियों का संयोजन 2020 सहित तीन चुनावों में विजयी साबित हुआ। और जब नीतीश ने लालू की राजद के साथ हाथ मिलाया- जैसा कि उन्होंने 2015 के चुनावों में किया था- तो सामाजिक न्याय की ताकतों या ओबीसी-ईबीसी गठबंधन ने प्रतिद्वंद्वी को मात दे दी।
लेकिन खराब स्वास्थ्य के चलते रिटायरमेंट की अटकलों ने नीतीश को बड़ा झटका दिया है। माना जा रहा है कि उनसे उनका ईबीसी वोट बैंक छीना जा सकता है। इससे एक सियासी मंथन शुरू हो गया है। ऐतिहासिक रूप से, भाजपा और संघ ने जाति जनगणना के विचार का लगातार इस आधार पर विरोध किया है कि यह हिंदू समाज को बांटेगा और हिंदुत्व के सिद्धांतों का उल्लंघन करेगा, जो हिंदुओं के एकीकरण का प्रयास करता है।
ऐसे में जातिगत जनगणना के फैसले को भाजपा के नाटकीय यू-टर्न के तौर पर देखा जा रहा है। गौरतलब है कि इस फैसले में संघ की रजामंदी भी शामिल है। यह इस तथ्य से स्पष्ट है कि यह घोषणा संघ प्रमुख मोहन भागवत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई बैठक के बाद की गई।
यहां इस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि नीतीश के कद को कम करने की भाजपा की कोशिशें 2020 के पिछले विधानसभा चुनाव में भी स्पष्ट थीं, जब चिराग पासवान और उनकी लोजपा को जदयू प्रमुख के खिलाफ आक्रामक अभियान चलाने और उनके वोट काटने के मकसद से चुनिंदा सीटों पर लड़ाया गया था।
इसके परिणामस्वरूप जदयू की सीटों में भारी गिरावट आई थी। 2015 में 71 से घटकर 2020 में यह 43 रह गई थी, जबकि भाजपा की सीटें 53 से बढ़कर 74 हो गई थीं। विडम्बना है कि गठबंधन में जदयू के जूनियर पार्टनर के रूप में उभरने के बावजूद भाजपा को नीतीश को मुख्यमंत्री बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा, क्योंकि उसे डर था कि कहीं नीतीश राजद के साथ जाकर सरकार न बना लें।
अलबत्ता, 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को झटका लगा। इसमें जदयू ने भाजपा के बराबर सीटें जीतीं। दोनों को 12-12 सीटें मिलने से साबित हुआ कि गिरते स्वास्थ्य और सत्ता-विरोधी लहर के बावजूद नीतीश ने ईबीसी वोटों को खींचने की अपनी क्षमता कायम रखी है।
जाति की राजनीति एक फिसलन भरी ढलान है, जैसा कि वीपी सिंह ने 1990 में अपनी अल्पमत की सरकार को बचाने के लिए मंडल-बम फोड़कर महसूस किया था। वे अपनी सरकार को तो फिर भी नहीं बचा पाए, लेकिन उत्तर भारत के राजनीतिक परिदृश्य को बदलने के लिए जरूर इतिहास में दर्ज हो गए।
भाजपा अब जाति जनगणना कराने के अपने निर्णय के साथ एक अपरिचित क्षेत्र में प्रवेश कर रही है। बिहार चुनाव मंडल 3.0 को नेविगेट करने की भाजपा की क्षमता का पहला परीक्षण होगा। दूसरी तरफ उसे राज्य की 15% उच्च जातियों पर भी अपनी पकड़ को मजबूत बनाए रखना है, क्योंकि सवर्णों को डर है कि अगर जाति जनगणना के आंकड़े अपनी कहानी खुद बयान करने लगे, तो इसका सबसे ज्यादा नुकसान भी उन्हें ही उठाना पड़ेगा।
जातिगत पुनर्मूल्यांकन की घोषणा भाजपा द्वारा नीतीश के ईबीसी वोटों में सेंध लगाने का साहसिक कदम है। ईबीसी राज्य की आबादी का 36% हैं। भाजपा इनकी मदद से बिहार में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरना चाहती है। (ये लेखिका के अपने विचार हैं।)








