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जनरेटिव एआई विस्मय और भय दोनों उत्पन्न करता है। आने वाला कल इसी का है, लेकिन वो कल कैसा होगा? कुछ पूर्वानुमान तो ऐसे परिदृश्य की ओर ले जाते हैं, जहां व्यापक सर्विलांस, भावनात्मक पहचान और ऑटोमेटेड कंटेंट जनरेशन की मदद से एआई समाज को नियंत्रित करेगा। लेकिन ऐसी बातों को एक तरफ रख भी दें तो यह तो सच है ही कि एआई हमारे संसार को बदल रहा है और आगे भी बदलता रहेगा। वास्तव में, जीडीपी के संदर्भ में तो एआई पहले ही पश्चिमी दुनिया में वर्तमान को आकार देने लगा है और भारत में भी इसकी बड़ी उपस्थिति का अनुमान है। अमेरिका में, 2025 के पहले नौ महीनों में जीडीपी वृद्धि में एआई निवेशों का योगदान लगभग 40% तक रहा। अर्न्स्ट एंड यंग का अनुमान है कि एआई अगले सात वर्षों में स्किलिंग और शिक्षा में निवेश के माध्यम से भारतीय जीडीपी में 1.2 से 1.5 ट्रिलियन डॉलर का योगदान देगा। माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, अमेजन और मेटा ने अगले पांच वर्षों में डेटा केंद्रों और एआई-आधारित निवेशों के लिए 67.5 अरब डॉलर का वादा किया है। भारत के अपने औद्योगिक समूह- टाटा, रिलायंस और अदाणी भी पीछे नहीं हैं। अदाणी ने अगले 10 वर्षों में रिन्यूएबल ऊर्जा-संचालित, एआई-रेडी डेटा केंद्रों में 100 अरब डॉलर निवेश करने की योजना बनाई है। ये आंकड़े जितने बड़े सुनाई देते हैं, वैश्विक स्तर पर अगले पांच वर्षों में अनुमानित निवेश की तुलना में वे नगण्य हैं। मैककिन्से एंड कम्पनी ने इसे 6.7 ट्रिलियन डॉलर आंका है। नए निवेशकों में से अधिकांश संभवतः प्रतिस्पर्धा में बाहर हो जाएंगे, लेकिन कुछ टिकेंगे और उत्पादकता बढ़ाएंगे। इन अकल्पनीय रूप से बड़े आंकड़ों से परे, बुनियादी सवाल यह है कि एआई का सामाजिक प्रभाव क्या होगा? क्या एआई का प्रसार उत्पादकता में व्यापक वृद्धि लाएगा या इसका उपयोग कुछ विशेष उद्योगों और समाज के कुछ वर्गों तक सीमित रहेगा? क्या हम एआई का उपयोग शिक्षा को इस तरह रूपांतरित करने के लिए कर पाएंगे कि उससे रोजगार-योग्य कौशल विकसित हों? या यह केवल मशीनों के जरिए नौकरियों का स्थान ले लेगा? चैटजीपीटी या जेमिनाई का उपयोग करने वाले अधिकांश लोग एआई को एक ऐसी सुपरफास्ट मैकेनिक यूनिट के रूप में देखते हैं, जो इंटरनेट सर्च के त्वरित उत्तर प्रदान करती है, सॉफ्टवेयर प्रोग्राम लिखती है, ग्रामर सुधारती है, समीक्षाएं और यहां तक कि लेख भी लिख देती है। अधिकांश यूजर्स इस सेवा के लिए कोई भुगतान नहीं करते। एआई के कुछ गंभीर यूजर्स ही इसके सब्स्क्रिप्शंस लेते हैं। इसलिए हमें लगता है कि यह हमारे और हमारे समाज के लिए मुफ्त है। हम यह नहीं समझते कि यह एआई प्रणाली भारी मात्रा में बिजली की खपत करती है और भीमकाय हार्डवेयर का उपयोग करती है। इसलिए एआई को लेकर इस पूरे उत्साह के बीच हमें यह प्रश्न उठाना चाहिए कि क्या एआई ऐसे समाधान भी प्रदान करेगा, जो प्रदूषण को कम करें और ऊर्जा का संरक्षण करें? या फिर एनर्जी के लिए एआई की अतृप्त-भूख अभावों और प्रदूषण को और बढ़ाएगी? एआई का मेडिकल फील्ड्स में व्यापक रूप से उपयोग किया जा रहा है। इलॉन मस्क ने अनुमान लगाया है कि 2030 तक एडवांस्ड एआई-संचालित रोबोट्स- विशेष रूप से टेस्ला का ऑप्टिमस- सर्वश्रेष्ठ मानव सर्जनों से भी बेहतर प्रदर्शन करने लगेंगे, जिससे पारंपरिक मेडिकल शिक्षा संभावित रूप से निरर्थक हो सकती है। लेकिन साथ ही, आशावादियों का यह तर्क भी है कि मनुष्य की सृजनात्मकता नए क्षेत्रों में रोजगार पैदा करेगी। टिकटॉक के रिसर्च-वैज्ञानिक शुपेंग चेन ने एक हालिया शोधपत्र में तर्क दिया है कि जहां एआई प्रचुर मात्रा में बुद्धिमत्ता लेकर आ रहा है, वहीं उसे तेजी से अपनाना उच्च स्तर पर लाखों पेशेवर व्हाइट कॉलर जॉब्स को अप्रासंगिक बना देगा। अमेरिकी अर्थव्यवस्था के आंकड़ों का उपयोग करते हुए चेन ने कहा है कि चूंकि व्हाइट कॉलर कर्मचारी उपभोक्ता-व्यय के आधे से अधिक हिस्से के लिए जिम्मेदार हैं, इसलिए एआई न केवल नौकरियों को प्रभावित करेगा, बल्कि उन वस्तुओं की मांग पर भी असर डालेगा, जिनका उत्पादन एआई कर रहा है। इससे ग्रोथ नहीं, बल्कि एक घोस्ट-इकोनॉमी उत्पन्न हो सकती है। फिर भी, यदि एआई वास्तव में वैसी ही एक फोर्स है, जैसा कि उसके यूजर्स मानते हैं, तो इसे नियंत्रित करने का सुझाव देना व्यर्थ होगा। आशा यही है कि मनुष्य की सृजनात्मकता एआई की गति के साथ तालमेल बिठाते हुए उसके नकारात्मक परिणामों को न्यूनतम करने का प्रयास करेगी। अधिकांश यूजर्स एआई के लिए कोई भुगतान नहीं करते। इसलिए हमें लगता है कि यह हमारे और हमारे समाज के लिए मुफ्त है। हम यह नहीं समझते कि यह एआई प्रणाली भारी मात्रा में बिजली की खपत करती है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
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