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तनाव और दबाव को अक्सर हम नकारात्मक शक्ति मानते हैं, पर विज्ञान का दूसरा पहलू यह भी है कि सही मात्रा में दबाव इंसान को ‘निखारने’ का काम करता है। विशेषज्ञ कहते हैं,‘दबाव सिर्फ तोड़ता नहीं है, बल्कि यह आपकी शारीरिक व मानसिक क्षमताओं को उस स्तर पर ले जाता है जिसे सामान्य स्थिति में पाना असंभव है। जैसे 20 साल की स्केटर एलिसा लियू ने दबाव को ‘रीफ्रेम’ किया और 25 साल बाद अमेरिका के लिए गोल्ड जीता, आम इंसान भी इसी तरह दबाव में श्रेष्ठ देने के लिए खुद को तैयार कर सकते हैं, जानिए कैसे… चुनौती की केमिस्ट्री एथलीट दबाव को ‘खतरे’ के बजाय ‘चुनौती’ के रूप में रीफ्रेम करता है, तो शरीर में घबराहट रोकने वाले रसायन निकलते हैं। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में न्यूरोसाइंटिस्ट केविन बिकार्ट कहते हैं, जब दिमाग भी इसे चुनौती मानता है, तो वह बेहतरीन प्रदर्शन की स्थिति पैदा करता है। इंद्रियां सामान्य से तेज हो जाती हैं, एकाग्रता शीर्ष पर होती है। बेहतर प्रदर्शन की वजह न्यूरोसाइंटिस्ट कैंडेस बी. पर्ट कहते हैं, ‘हमारे शरीर में डोपामाइन जैसे रसायन ‘डाक सेवा’ की तरह काम करते हैं।जैसे डाकिया संदेश पहुंचाता है, वैसे ही ये रसायन शरीर में संदेश फैलाते हैं कि उसे कब और कैसे प्रतिक्रिया देना है। ये ‘संदेश’ ही तय करते हैं कि तनाव की स्थिति में शरीर घबराकर रुक जाएगा या फिर पूरी ताकत के साथ शानदार प्रदर्शन करेगा। डर पर नियंत्रण दबाव में निखरने वाले लोग नियंत्रित अभ्यास का सहारा लेते हैं। जैसे सर्फर लेयर्ड हैमिल्टन बर्फ के पानी में डुबकी लगाते हैं। यह अभ्यास दिमाग के खतरे के अलार्म की सीमा बढ़ा देता है।जब आप खुद को बार-बार नियंत्रित तनाव में रखते हैं, तो तंत्रिका तंत्र और मजबूत हो जाता है। जैसे स्कीयर मिकाएला शिफ्रिन ने घबराहट को नकारा नहीं, बल्कि उसे स्वीकार कर बेहतर प्रदर्शन का साधन बना लिया। पूरा खेल नजरिए का स्पोर्ट्स साइंटिस्ट जिम लोहेर कहते हैं,‘दबाव तो शरीर का ईंधन है। फर्क इससे पड़ता है कि इसे किस तरह देखते हैं। अगर बड़े खिलाड़ियों (जैसे शिफ्रिन या लियू) की तरह दबाव को डर समझने के बजाय ‘कुदरती ताकत’ की तरह देखें, तो यही तनाव ‘महान’ बना सकता है। महानता वह नहीं जो दबाव महसूस न करे, बल्कि वह है जो इस ‘केमिकल अलार्म’ को नियंत्रित कर उसे ऊर्जा भंडार में बदल दे।’
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