पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:  सत्संग सुनने जाएं तो तन के साथ मन को भी स्नान कराएं
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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: सत्संग सुनने जाएं तो तन के साथ मन को भी स्नान कराएं

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  • Pt. Vijayshankar Mehta’s Column When You Go To Listen To Satsang, Bathe Your Mind Along With Your Body.

33 मिनट पहले

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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar

पं. विजयशंकर मेहता

सत्संग सुनने का भी अपना प्रोटोकॉल है। गरुड़ जी जब काकभुशुंडि जी के यहां गए तो सत्संग हो रहा था वटवृक्ष के नीचे। तुलसीदास जी लिखते हैं- करि तड़ाग मज्जन जलपाना, बट तर गयउ हृदयँ हरषाना। तालाब में स्नान और जलपान करके वे प्रसन्नचित्त से वटवृक्ष के नीचे गए। अब तीन बातें यहां लिखी हैं।

पहला, स्नान किया, फिर जलपान किया और फिर प्रसन्नचित्त हुए। जब भी सत्संग सुनने जाएं, तन की शुद्धि करें, कुछ खा-पीकर भी जाएं क्योंकि भूखे भजन न होय गोपाला और प्रसन्नचित्त रहें। दुनियादारी की चिंता जूते-चप्पल के साथ ही बाहर उतार कर आएं। यहां स्नान का एक और गहरा अर्थ है।

हमारे शास्त्रों में लिखा है कि मनुष्य को मंत्र-स्नान भी करना चाहिए। तन को हम पानी से स्नान कराते हैं, पर मन को स्नान कराने के लिए प्राणवायु लगती है। तो कोई मंत्र लें, सांस में उसको उतारें और शरीर में ऐसे बहाएं जैसे हम अपने मन को धो रहे हैं। फिर सत्संग में बैठिए। इतना करने के बाद जो सत्संग में हमें मिलेगा, वो अनूठा, अद्भुत और बहुत उपयोगी होगा।

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