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- Lt. Gen. Syed Ata Hasnain’s Column: Our Reactions To Pakistan Are Changing.
3 घंटे पहले
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लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन कश्मीर कोर के पूर्व कमांडर
भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में अस्थिरता कायम है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद से ही दोनों में कोई बड़ी लड़ाई, कूटनीतिक संबंधों में नाटकीय विच्छेद या लंबा सैन्य तनाव नहीं हुआ है, फिर भी रणनीतिक माहौल में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं। जो नियम कभी संकट के वक्त लागू होते थे- वे बदल रहे हैं। दोनों देश इस नई वास्तविकता के प्रति खुद को ढाल भी रहे हैं।
भारत के लिए वही सवाल आज भी कायम है कि पाकिस्तान प्रायोजित हिंसा अगली बार बर्दाश्त से बाहर हुई तो हम कैसी प्रतिक्रिया देंगे? हाल में दिल्ली में हुए कार ब्लास्ट ने चिंताएं और बढ़ा दी हैं। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि यह षड्यंत्र और व्यापक रूप ले सकता था, लेकिन उसे बीच में ही रोक दिया गया। ऐसे में उपरोक्त सवाल का जवाब घोषणाओं नहीं, हालिया अनुभवों और पाकिस्तान में हो रहे बदलावों में छिपा है।
इसे समझने के लिए ऑपरेशन सिंदूर सबसे अहम संदर्भ है। इसने हमारे माइंडसेट को उजागर किया। भारत ने दिखाया कि वह परमाणु सीमा में रहते हुए संतुलित सैन्य बल इस्तेमाल करने को तैयार है। इसमें राजनीतिक मंजूरी जल्द मिल जाती है और लक्ष्य भी सीमित होते हैं। संदेश यह था कि आतंकवाद के जवाब में भारत अब महज संयम पर ही निर्भर नहीं रहेगा।
उतना ही महत्वपूर्ण यह जानना भी है कि ऑपरेशन सिंदूर ने कौन-से संकेत नहीं दिए। भारत छोटे ऑपरेशन, तय समय सीमा और सैन्य तनाव में बढ़ोतरी के ऐसे तरीकों में नहीं बंधा, जिनका पूर्वानुमान लगाया जा सकता हो। कहीं भी यह नहीं कहा गया कि भविष्य में सैन्य कार्रवाई प्रतीकात्मक या निश्चित अवधि वाली होगी। यह अस्पष्टता भी मायने रखती है।
यदि विरोधी पहले ही जान ले कि जवाबी कार्रवाई कैसे, कब और कितनी देर में होगी तो वह उसे अपने आकलन में शामिल कर सकता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जानबूझकर ऐसे सवालों को अनुत्तरित छोड़ा गया था। जब भारत प्रतिक्रिया को लेकर अपना रुख स्पष्ट कर रहा था तो पाकिस्तान के भीतर भी बदलाव चल रहे थे।
पाकिस्तानी संविधान में प्रस्तावित 27वां संशोधन महज एक कानूनी बदलाव नहीं है। सेना प्रमुख को चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेस बनाना, सेना के सामूहिक ढांचे को समाप्त करना और परमाणु कमान को पूरी तरह सैन्य नियंत्रण में लाना- यह बताता है कि सारा नियंत्रण अब शीर्ष पर केंद्रित हो रहा है।
भारत के लिए चुनौती यह है कि वह पाकिस्तान के इन संकेतों का जवाब कैसे दे, जिससे तनाव भी ना बढ़े और यह भी नहीं दिखे कि वह चुपचाप बैठा है। परमाणु धमकियों के कारण यदि पारंपरिक और मिश्रित प्रतिक्रियाएं भी रोक दी जाएं तो यह पाकिस्तान की प्रॉक्सी युद्ध की रणनीति को और प्रभावकारी बनाता है।
इसलिए प्रतिरोध का मतलब है कि भारत दिखाए परमाणु हमले की धमकियां उसके विकल्पों पर पूर्ण विराम नहीं लगातीं। इसका मतलब अनावश्यक तनाव बढ़ाना नहीं, कार्रवाई की स्वतंत्रता बनाए रखना है। कश्मीर इस पूरे बदलाव का केंद्र बना हुआ है। हाल के वर्षों में कश्मीर घाटी की तुलना में जम्मू, खासकर रजौरी, पुंछ और कठुआ में अधिक हिंसा हुई है। यह मायने रखता है। पाकिस्तान का सियासी नैरेटिव और उसकी अंतरराष्ट्रीय स्थिति जम्मू के बजाय कश्मीर के इर्द-गिर्द घूमती है।
घाटी में लंबे समय की शांति उस मुद्दे पर पाकिस्तान की प्रासंगिकता घटाती है, जिसे वह अपनी पहचान का मूल मानता है। पहलगाम हमला इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह किसी सतत अभियान की शुरुआत से ज्यादा ऐसे वक्त में कश्मीर में फिर से मौजूदगी दिखाने का प्रयास लगता है, जब वहां पर्यटन, नागरिक गतिविधियां और सामान्य स्थिति की भावना मजबूत हो रही थी। इतिहास गवाह है कि जब भी पाकिस्तान को कश्मीर में अपनी प्रासंगिकता घटती महसूस हुई, उसने खुले टकराव के बजाय सीमित तौर पर व्यवधान पैदा करने वाली हरकतों का सहारा लिया।
स्पष्ट है कि भारत-पाकिस्तान रिश्ते किसी जरूरी टकराव की ओर नहीं बढ़ रहे हैं, लेकिन वे बदली हुई मान्यताओं के तहत संचालित हो रहे हैं। भारत ने बिना कोई सीमा तय किए जवाबी कार्रवाई की इच्छाशक्ति दिखाई है तो पाकिस्तान ने प्रॉक्सी रणनीति पर निर्भरता समाप्त किए बिना केंद्रीकरण के जरिए ताकत दिखाने का प्रयास किया है।
आज पाकिस्तान के प्रतिरोध का मतलब है भारत यह दिखाए कि परमाणु हमले की धमकियां उसके विकल्पों पर पूर्ण विराम नहीं लगातीं। इसका मतलब अनावश्यक तनाव बढ़ाना नहीं, बल्कि कार्रवाई की अपनी स्वतंत्रता बनाए रखना है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)








