सहकर्मियों के साथ ज्यादा वक्त बिगाड़ सकता है सामाजिक मेलजोल:  रिसर्च; चौबीस घंटे एक ही चेहरा देखने से फाइट मोड में आता है दिमाग
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सहकर्मियों के साथ ज्यादा वक्त बिगाड़ सकता है सामाजिक मेलजोल: रिसर्च; चौबीस घंटे एक ही चेहरा देखने से फाइट मोड में आता है दिमाग

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कल्पना कीजिए… तापमान शून्य से 80 डिग्री नीचे, चारों तरफ हजारों किलोमीटर तक सिर्फ बर्फ का सन्नाटा, चार महीने का लगातार घुप अंधेरा और एक बंद कमरे में आपके साथ सिर्फ 11 लोग। शुरुआत में तो यह रोमांचक लग सकता है, लेकिन कुछ ही हफ्तों में यही साथी आपको अपने सबसे बड़े दुश्मन नजर आने लगेंगे! बात इतनी बढ़ जाएगी कि आप एक-दूसरे की शक्ल देखना तो दूर, जान लेने पर उतारू हो सकते हैं। यह हॉलीवुड फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे शांत कोने यानी अंटार्कटिका के रिसर्च स्टेशन की डरावनी हकीकत है। ‘प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज’ (पीएनएएस) में प्रकाशित स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि सीमित दायरे में सहकर्मियों के साथ जरूरत से ज्यादा वक्त बिताना इंसानी दिमाग को बीमार और हिंसक बना देता है। यह स्टडी फ्रांस व इटली के अंटार्कटिका स्थित ‘कॉन्कॉर्डिया’ रिसर्च स्टेशन पर किया गया। यहां 12 वैज्ञानिकों (हाइवरनॉट्स) को 10 महीने के मिशन पर साथ रखा गया था। इनके कपड़ों में खास सेंसर्स लगाए गए, ताकि पता चल सके कि ये एक-दूसरे के कितने करीब रहते हैं। जैसे-जैसे मिशन आगे बढ़ा और बाहर का माहौल बर्फीला होता गया, वैज्ञानिकों का मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा। उनमें अकेलापन, काम में लापरवाही और ‘पैरानॉयड’ (अकारण गंभीर शक करने की बीमारी) के लक्षण दिखने लगे। हैरानी की बात यह रही कि जो वैज्ञानिक आपस में ज्यादा बातचीत कर रहे थे, उनके बीच विवाद, चिड़चिड़ाहट व अविश्वास सबसे ज्यादा दिखा। इतना ही नहीं, अवसाद के कारण वैज्ञानिक राष्ट्रीयता के आधार पर गुटों में बंट गए और दूसरों को शक की निगाह से देखने लगे। रिसर्च भले ही बर्फ के बीच हुई हो, पर बड़ा सबक स्पेस साइंस के लिए है। लंबी दूरी के स्पेस मिशन पर जाने वाले एस्ट्रोनॉट्स को भी बरसों तक छोटे से कैप्सूल में साथ रहना होगा। वैज्ञानिक कहते हैं,‘सिर्फ रॉकेट उड़ाना सीख लेना काफी नहीं है; मिशन पर जाने वाले वैज्ञानिकों को ‘विवाद प्रबंधन’ सिखाना बेहद जरूरी है, वरना अंतरिक्ष की गहराइयों में तकनीकी खराबी से पहले आपसी नफरत मिशन को तबाह कर देगी।’ इंसान सामाजिक है, पर ‘प्राइवेसी’ पहली जरूरत – एक्सपर्ट
आमतौर पर कहा जाता है कि टीम के साथ घुलने-मिलने से तनाव कम होता है, पर स्टडी की लेखिका जेन श्मुत्ज कहती हैं,‘अंटार्कटिका जैसे बंद माहौल में इसका ठीक उल्टा होता है। इंसान सामाजिक प्राणी है, पर उसे प्राइवेसी चाहिए होती है। महीनों तक 24 घंटे एक ही चेहरा सामने हो, तो प्राइवेसी खत्म हो जाती है और दिमाग ‘फाइट मोड’ में आ जाता है। इसके उदाहरण इतिहास में भी दर्ज हैं। 2018 में अंटार्कटिका के बेस पर रूसी इंजीनियर ने साथी को इसलिए चाकू घोंप दिया था, क्योंकि वह उसे किताबों का सस्पेंस बताकर चिढ़ाता था। वहीं, हाल ही में द. कोरियाई वैज्ञानिक को सहकर्मियों को चाकू से धमकाने के आरोप में वापस बुलाना पड़ा।



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