रसरंग में चिंतन:  आंगन में उतरी सर्दी के आशीर्वाद को ग्रहण करें
अअनुबंधित

रसरंग में चिंतन: आंगन में उतरी सर्दी के आशीर्वाद को ग्रहण करें

Spread the love


गुणवंत शाह1 घंटे पहले

  • कॉपी लिंक

संसार की सारी चिंताएं छोड़कर जो इंसान सर्दियों की सुबह की धूप को अपने भीतर समेट लेता है, वही सचमुच ईमानदार होता है। धूप को भीतर छिपाने का मतलब है उस गुनगुनी रोशनी में डूबकर खुद से कुछ सोचने, कुछ नया करने की तैयारी करना। हमारे देश में सर्दी का मौसम मुश्किल से तीन महीने रहता है। अगर यह सात-आठ महीने रहता तो शायद हमारी गरीबी इतनी पीड़ादायक न होती।

सर्दियां कर्मठता को समेटती हैं, पर उत्पादकता बढ़ाती हैं। गर्मी आलस्य और जनसंख्या दोनों बढ़ाती है। सर्दियों में अधिक काम करने पर भी थकान नहीं होती, जबकि गर्मी में बिना काम के भी थकावट घेर लेती है। हमारे नेता शायद यह सुनिश्चित करने में लगे हैं कि गरीब की पीठ की दरार कभी न भरे, क्योंकि गरीबी ही उनकी राजनीति का आधार है। गर्मी गरीबी को बढ़ाती है, जबकि सर्दी की बेटी का नाम है स्फूर्ति। ऊर्जा से ही समृद्धि आती है। जो काम एक घंटे में हो सकता है, उसे तीन घंटे में करना ही गरीबी की जड़ है। सरकारी दफ्तरों में रखे चाय के प्याले हर घूंट में कर्मचारी को गरीबी पिलाते हैं। पश्चिमी देशों में न ऐसा रिवाज है, न सुविधा। आदिमानव चलता रहा… बस चलता रहा। दौड़ना तब शुरू हुआ, जब उसके पीछे कोई जानवर पड़ा। विवशता में शुरू हुई दौड़ ने उसकी चाल की गति तीन गुना बढ़ा दी। उस समय न चक्र की खोज हुई थी, न अग्नि की। गति के इसी विस्तार से बाद में संस्कृति का जन्म हुआ, साइकिल की खोज के साथ।

तंजानिया के जंगलों में मैंने लकड़ी के पहियों वाली साइकिलें देखीं। साइकिल ने इंसान में क्या बदला? उसने दौड़ने को रोमांटिक बना दिया। पैडल मारते हुए संतुलन और दिशा बनाए रखना, यही उसका सौंदर्य है। साइकिल ने परिश्रम घटाया, आनंद बढ़ाया। यह अचरज है कि साइकिल के आविष्कारक को नोबेल पुरस्कार क्यों नहीं मिला।

पश्चिम की नई पीढ़ी ने साइकिल को अपना आत्मीय बना लिया है। वहां की कठोर सर्दी भी उसकी लोकप्रियता को नहीं रोक पाई। नार्वे की राजधानी ओस्लो में एक सम्मेलन के दौरान मैंने नाटक देखा – ‘द बाइसिकल।’ मंच पर नायक के साथ कई तरह की साइकिलें थीं, कथा का केंद्र था नायक का साइकिल के प्रति प्रेम। बीटल्स के संस्थापक जॉन लेनन ने कहा था, ‘जब मैं बच्चा था, तब मैंने सपना देखा कि मेरे पास साइकिल है। जब वह सपना पूरा हुआ, तब मैं दुनिया का सबसे खुश इंसान था। मेरे दोस्त अपनी साइकिल बाहर रखते थे, पर मैं नहीं। पहली रात मैंने अपनी साइकिल अपने बिस्तर पर रखी थी।’

सर्दियां दस्तक देने लगी हैं। सुनसान सड़क पर अंधेरा ठंडा होता है, पर पांच किलोमीटर साइकिल चलाते ही ठंड गायब हो जाती है और भीतर स्फूर्ति दौड़ने लगती है। उस अंधेरे में आप अकेले नहीं होते। आपके साथ आपकी रोमांटिक स्फूर्ति होती है। सुखी होने की एक ही शर्त है रोमांटिक स्फूर्ति। शंकराचार्य ने कहा था, ‘ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या।’ विनोबा भावे ने जोड़ा, ‘ब्रह्म सत्यं, जगत भी सत्य।’ सुबह-सुबह जब सर्दी अपने शबाब पर होती है, तब जो व्यक्ति रजाई छोड़कर ठंड के साम्राज्य में निकल पड़ता है, वह सड़क पर नहीं, बल्कि स्फूर्ति के उपवन में टहल रहा होता है। अमीर की रजाई भारी होती है, गरीब की चादर हल्की। जब सर्दी कड़कड़ाने लगती है, तब ठंड खिड़की की दरारों से भीतर चली आती है और कानों में एक निजी बात कहती है, जिसमें सारे धर्मों का सार छिपा होता है। प्रार्थना किसी भी समय की जा सकती है, पर सर्दियों की सुबह बिस्तर पर बैठकर की गई प्रार्थना कुछ अधिक पवित्र होती है। रात की ठंड में जब घर शांत होता है, तब वही इंसान सर्दी की वह फुसफुसाहट सुनता है, जो ऊष्मा की तलाश सिखाती है।

‘जो दूसरों को ऊष्मा देता है, वही स्वयं ऊष्मा पाता है।’ सर्दियों में यह बात गहराई से समझ आती है कि जीवन में ऊष्मा से मूल्यवान कुछ नहीं। त्यागना ही भोगने का एक रूप है, यही ऊष्मा का अध्यात्म है। ईशावास्य उपनिषद के ऋषि दीर्घतमस ने सूत्र दिया था – ‘त्याग के साथ भोगना सीखो।’ यह शिक्षा किसी मां को नहीं दी जाती, क्योंकि मां इसका साक्षात रूप है। मां की गोद हर बच्चे का पहला ऊष्मा तीर्थ है। पूरी मानवता उसी ऊष्मा पर टिकी है। मां की ऊष्मा के बाद इंसान अपने प्रिय की ऊष्मा खोजता है। आज की भाषा में इसे ‘लव अफेयर’ कहा जाता है, लेकिन यह वास्तव में ‘ऊष्मा अफेयर’ है। सर्दी ऊष्मा के अध्यात्म को समझने की ऋतु है। अब सर्दी आपके आंगन में उतर आई है तो उसके आशीर्वाद को जरूर ग्रहण करें। उस ऊष्मा से वंचित रह जाना सचमुच घाटे का सौदा होगा।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *