रसरंग में मायथोलॉजी:  वृक्षों के मूल निवासी हैं देवता, फिर भी क्यों जारी है पेड़ों का विनाश?
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रसरंग में मायथोलॉजी: वृक्षों के मूल निवासी हैं देवता, फिर भी क्यों जारी है पेड़ों का विनाश?

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देश के तमाम भागों में विकास के नाम पर बड़ी आसानी से पेड़ों की बलि दे दी जाती है। लेकिन क्या पेड़ को काटते समय हमें यह ध्यान रहता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में मंदिरों से पहले वन ही हमारे पवित्र स्थल रहे हैं?
वास्तव में भारतीय धार्मिक कल्पना की सबसे प्राचीन दिव्य मौजूदगियों में से एक यक्ष और यक्षिणियां रहे हैं। वैदिक देवताओं की पूजा और धर्मग्रंथों के रचे जाने से भी पहले लोग उन्हें पूजते थे। यह मान्यता थी कि वे पीपल में निवास करते थे और उनकी सभा वट वृक्ष में होती थी। इसलिए लोग इन वृक्षों का केवल सम्मान ही नहीं करते थे, बल्कि उनका इनके साथ गहरा संबंध भी था। किसी शाखा को भी काटने से पहले उसमें रहने वाले यक्ष से अनुमति ली जाती थी। इतना ही नहीं, जैसे हम किसी अतिथि को भोजन देते हैं, वैसे ही वृक्षों की जड़ों पर भेंट-सामग्री भी रखी जाती थी।
यक्षों को दिए गए महत्व का एक उदाहरण हम सांची के स्तूप की वेदिकाओं पर पाते हैं। उन पर वृक्षों से लिपटे यक्षों और यक्षिणियों की कई उत्कृष्ट आकृतियां हैं। लेकिन यह मात्र सजावट नहीं थी। इन आकृतियों ने उस विचार को मूर्त रूप दिया कि यक्ष और यक्षिणियां प्रचुरता तथा उर्वरता से जुड़े हैं।
जैन परंपरा का वृक्षों के साथ और भी गहरा संबंध है। प्रत्येक तीर्थंकर ने किसी विशेष वृक्ष के नीचे बैठकर केवलज्ञान प्राप्त किया, जिसे केवलवृक्ष कहा जाता है। उदाहरणार्थ, महावीर साल वृक्ष से और ऋषभदेव वट वृक्ष से जुड़े हैं। जैन धर्म में अहिंसा की अभिव्यक्ति वनस्पति जगत को भी समेटती है। इसका कारण यह मान्यता है कि वृक्षों को अपने अस्तित्व का बोध होता है। इसलिए बिना कारण किसी वृक्ष को क्षति पहुंचाना नैतिक विफलता माना जाता है।
सिद्धार्थ गौतम को पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर प्रबोधन प्राप्त हुआ। बौद्ध धर्म की सबसे प्रसिद्ध प्रतिमा इसी घटना की है। लेकिन पीपल का वृक्ष बुद्ध के समय से बहुत पहले से पवित्र माना जाता रहा है। चार हजार वर्ष पुरानी सिंधु घाटी सभ्यता की मुहरों पर भी उसे अंकित पाया गया है। इस वृक्ष के हृदयाकार पत्तों, उसकी विशाल छाया और सदियों तक जीवित रहने की क्षमता के कारण प्राचीन काल से लोगों को उसमें देवत्व का बोध हुआ।
पौराणिक परंपराओं ने इन सभी विचारों को आत्मसात कर उन्हें देवताओं के साथ जोड़ दिया। विष्णु वटपत्रशायी के रूप में वर्णित हैं – शिशु अवस्था में वट वृक्ष के पत्ते पर लेटे हुए, प्रलय के जल पर तैरते हुए। सृष्टि का अंत हो चुका है और केवल वट वृक्ष का पत्ता जीवित है। शिव बिल्व वृक्ष से जुड़े हैं। तीन पत्तियों वाले बिल्वपत्र को तोड़ने से पहले शिव का आवाहन किया जाता है। वृंदावन में कृष्ण भी कदंब की छाया में बांसुरी वादन करते हैं।
ये सभी विचार मध्य प्रदेश के धार जिले के राजगढ़ में स्थित एक शनि मंदिर में उल्लेखनीय रूप से जीवित हैं। इस मंदिर में कोई मानव-निर्मित मूर्ति नहीं है, बल्कि यहां एक जीवित वट वृक्ष के तने और उसकी जड़ों की पूजा की जाती है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी श्रद्धालु उस पर सिंदूर चढ़ाते आए हैं। मंदिर की दीवारें वृक्ष के चारों ओर बनाई गई हैं। इस प्रकार वृक्ष ने ही निर्धारित किया कि मंदिर कहां बनेगा। यहां देवता को किसी ने प्रतिष्ठापित नहीं किया। आज के अधिकांश मंदिरों की तुलना में यह मंदिर असाधारण लगता है। लेकिन तीन हजार वर्ष पहले ऐसे पूजनीय स्थल सामान्य बात थी।
तो इस अवधि में क्या बदल गया? लोग चार दीवारों को भक्ति का स्वरूप मानने लगे, जबकि यक्ष आज भी पीपल के निवासी हैं। शिव आज भी बिल्व से जुड़े हैं। राजगढ़ के शनि देव आज भी अपने वट वृक्ष में हैं।
विडंबना यह है कि हम कहते हैं- “प्रकृति देवो भव’ और साथ ही वृक्ष काटते जाते हैं या कटते वृक्षों को मूक दर्शक की तरह देखते रहते हैं।



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