रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से:  फिल्मी गानों से हमेशा दूर क्यों रहे बशीर बद्र!
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रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से: फिल्मी गानों से हमेशा दूर क्यों रहे बशीर बद्र!

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बीती 28 मई को ईद वाले दिन ही खबर आई कि मशहूर शायर बशीर बद्र साहब नहीं रहे। यह सुनकर दिल को गहरा धक्का लगा। यह सच है कि जो भी इंसान इस दुनिया में आया है, उसे एक दिन जाना ही है, मगर कुछ शख्सियतें ऐसी होती हैं जिनके जाने पर लगता है कि इन्हें अभी नहीं जाना चाहिए था। मेरा यह कॉलम अक्सर फिल्मों से जुड़े लोगों के बारे में होता है, इसलिए आज मैं आपको बताऊंगा कि बशीर बद्र साहब का फिल्म इंडस्ट्री और मुझसे क्या कनेक्शन था। बात 60 के दशक की है, जब बशीर साहब एक नौजवान शायर थे और पूरे देश में उतने मशहूर नहीं हुए थे। उस दौर की ख्यात अभिनेत्री मीना कुमारी जी को शायरी का बहुत शौक था और वे स्वयं भी एक अच्छी शायरा थीं। किसी ने उन्हें बशीर साहब का एक शेर सुनाया, जो उन्हें बहुत पसंद आया, मगर सुनाने वाले ने शायर का नाम नहीं बताया। मीना कुमारी जी की आदत थी कि उन्हें जो भी शेर अच्छा लगता, उसे वे अपनी डायरी में लिख लिया करती थीं। जब उन्होंने एक फिल्म मैगजीन को इंटरव्यू दिया तो उसमें छपी अपनी तस्वीर के साथ उन्होंने वही शेर लिख दिया, “उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।” मीना जी के जरिए से यह शेर पूरे देश में मशहूर हो गया और तब बशीर साहब पहली बार दुनिया की नजर में आए। एक अच्छा शायर, अच्छा कलाम आपको जिंदगी में किस तरह दिशा और हौसला देता है, इसकी मिसाल मैं खुद हूं। बात 70 के दशक की है, जब मैं छोटा था। भोपाल के सेफिया कॉलेज में एक मुशायरा था, जहां मेरे पैरेंट्स मुझे भी साथ ले गए। मुझे उस वक्त शेरो-शायरी की ज्यादा समझ नहीं थी, लेकिन जितना समझ आता था, उसे सुनकर आनंद ले रहा था। तभी बशीर बद्र साहब खड़े हुए और उन्होंने कहा कि मैं एक शेर नौजवानों की नजर कर रहा हूं। अगर आप इसके मुताबिक खुद को ढालेंगे तो जिंदगी में जरूर कामयाब होंगे। उन्होंने पढ़ा:

“फूल से आशिक़ी का हुनर सीख ले,
तितलियां ख़ुद रुकेंगी सदाएं न दे।’

यह शेर मुझे याद हो गया और घर आकर मैंने अपनी नोटबुक के पहले पन्ने पर इसे कैलीग्राफी में लिख लिया। वहीं से मेरे जहन में यह बात बैठ गई कि खुद के अंदर इतनी काबिलियत पैदा करो कि सफलता खुद चलकर तुम्हारे पास आए। इसके बाद जब मैं मुंबई आया तो लोग मुझे समझाते थे कि तुम नहीं जानते, मुंबई कैसा शहर है। मुझे याद है, तब बशीर साहब का ही एक शेर सुनाया गया था, “ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।’ जब कोई मुझसे पूछता कि मुंबई आए कितने साल हो गए और कब तक कोशिश करोगे तो मैं कहता, “जिस दिन से चला हूं मेरी मंज़िल पे नज़र है, आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा।’ लोग पूछते थे कि अगर कामयाब नहीं हुए तो क्या वापस भोपाल जाओगे? मैं कहता था कि ऐसा हो ही नहीं सकता। मैं बशीर साहब का शेर दोहराता, “हम दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा।’ जब लोग कहते कि आप कितने किस्मत वाले हैं कि आपको फिल्म इंडस्ट्री और जनता का इतना प्यार मिला है तो मैं कहता, “ये फूल कोई मुझको विरासत में मिले हैं, तुमने मेरा कांटों भरा बिस्तर नहीं देखा।’ बशीर साहब का एक और फिल्मी कनेक्शन आज के दौर के मशहूर डायरेक्टर विशाल भारद्वाज से है। विशाल मेरठ में बशीर साहब के मोहल्ले में ही रहते थे। विशाल जी को भी शायरी का बड़ा शौक था और वे बचपन से ही शायरी समझते थे। इसलिए बशीर साहब भी उन्हें बहुत चाहते थे और अक्सर शाम को अपने घर बुला लिया करते थे। बकौल विशाल, ‘मैं और एक बुजुर्ग भंडारी साहब उनके यहां बैठते थे और बशीर साहब हमें अपना नया कलाम सुनाते थे। मेरी याददाश्त बहुत तेज थी, इसलिए मुझे बशीर साहब के शेर याद हो जाते थे। 1987 के मेरठ दंगों में जब बशीर साहब का घर जला दिया गया, तब उन्होंने लिखा था- “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।’ उस आग में बशीर साहब की 20-25 नई गजलें, जो उन्होंने एक डायरी में लिखकर रखी थीं, जलकर खाक हो गईं। वे अप्रकाशित थीं और वे उनका दीवान छपवाना चाहते थे। बशीर साहब के लिए यह एक अनमोल धरोहर थी। इसका उन्हें बहुत गहरा सदमा पहुंचा। एक शायर का वह कलाम जल जाए जो अभी तक न छपा हो, न सुनाया गया हो और न ही लोगों तक पहुंचा हो तो उस दर्द को समझा जा सकता है। मगर विशाल एक तरह से उनके लिए फरिश्ता बनकर आए। उन्होंने कहा, “बशीर साहब, आपने जितनी गजलें सुनाई हैं, वे सब मुझे याद हैं।’ बशीर साहब हैरान रह गए। इसके बाद कई दिनों तक बैठकर विशाल ने उन्हें उनकी गजलें दोबारा लिखवाईं। किसी का एक मिसरा उन्हें याद था, किसी का दूसरा मिसरा। कुछ जगह शब्द आगे-पीछे थे, लेकिन चूंकि वे बशीर साहब की अपनी रचनाएं थीं, इसलिए जैसे ही विशाल उन्हें याद दिलाते, पूरा शेर उनके जहन में लौट आता। इस तरह विशाल की बदौलत बशीर साहब उस जले हुए दीवान को दोबारा लिख और पूरा कर पाए। फिर विशाल भी बशीर साहब के शेरों को जहन में रखकर मुंबई आए। यहां उन्होंने बड़ा नाम कमाया। फिल्मों में बशीर साहब की ज्यादा रुचि नहीं थी, लेकिन विशाल से लगाव के कारण उन्होंने फिल्म ‘बेताबी’ के लिए एक गाना लिखा – “गुनगुनाती हुई एक नदी मिल गई, अजनबी शहर में दोस्ती मिल गई…’ बशीर साहब का हर शेर अनमोल है। उनकी याद में विशाल भारद्वाज के संगीत से सजा उनका यह फिल्मी गीत सुनिए, अपना ख्याल रखिए और खुश रहिए।



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