पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:  अपनी हार का डर हो, ताकि जीत की प्रेरणा मिलती रहे
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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: अपनी हार का डर हो, ताकि जीत की प्रेरणा मिलती रहे

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बड़े-बड़े खिलाड़ियों से बनी अंतरराष्ट्रीय टीमें भी हार और जीत के लिए किसी न किसी से प्रेरणा लेती हैं। इन टीमों के मैनेजर इस बात के गवाह होते हैं कि तैयारी कैसी की गई, मैच कैसा खेला गया और परिणाम कैसा और क्यों आया? समझदार कोच और मैनेजर खिलाड़ियों पर एक प्रयोग करते हैं। वो एक डर को जिंदा रखते हैं और वो है हार का डर, जो जीत की प्रेरणा बनता है। हमारे यहां शास्त्रों में नारद इसी तरह के कोच और प्रबंधक हैं। वे देवताओं और राक्षसों के बीच समान रूप से सम्मानित हैं। कहीं भी पहुंच जाते हैं। नारद की कार्यशैली ऐसी है कि वो सामने वाले को डराते हैं, उकसाते हैं और प्रेरणा भी देते हैं। इस सबके पीछे नारद का मकसद एक ही होता है। ईश्वर के विधान का ठीक से संचालन हो। परमात्मा जब अवतार ले तो उसके अवतार-कार्य में सहयोग के लिए घटनाएं जल्दी तैयार हो जाएं। इसीलिए नारद ने कंस को, रावण को ऐसी सलाहें दी कि उनका समापन जल्दी हो गया। तो मनुष्य को कहीं न कहीं अपनी हार का डर जरूर होना चाहिए, ताकि जीत की प्रेरणा मिलती रहे।



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