टिपण्णी

पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: वो भाग्यशाली होते हैं, जिनके जीवन में भक्ति का प्रवेश हो

Spread the love




हम इंसानों की जिंदगी ‘मनचाहा’ और ‘अनचाहा’ के बीच में झूलती रहती है। सुख मनचाहा है और दुख अनचाहा। तुलसीदास जी ने एक सूत्र दिया है। यदि ऐसा सुख चाहते हो, जिसके पीछे दुख न आए तो उन्होंने सुख की खान बताई है- भक्ति। इसीलिए काकभुशुंडि जी ने कहा- सब सुख खानि भगति तैं मागी। नहिं जग कोउ तोहि सम बड़भागी। जब मैंने राम जी से भक्ति मांगी तो राम जी ने मुझसे यह बोला कि तूने सब सुखों की खान भक्ति मांग ली है, जगत में तेरे समान बड़भागी कोई नहीं। तो वो भाग्यशाली हैं, जिनके जीवन में भक्ति आ जाए। लेकिन कुछ दुर्भाग्यशाली ऐसे भी हैं, जो भक्ति आने के बाद भी दुरुपयोग कर जाते हैं। उनमें से एक था रावण। रावण शिवभक्त था, शिवजी ने उसको भक्ति भी प्रदान की, पर रावण उसका दुरुपयोग कर गया। विजयदशमी के दिन आज हम व्यक्ति रावण से न जुड़ें, बल्कि मनुष्य के मनोविज्ञान से जुड़ें कि भक्ति आने पर भी लोग उसका सदुपयोग नहीं कर पाते। नतीजे में कोई भी रावण बन सकता है।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *