पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:  जब सामर्थ्य समाप्त हो जाती है, तो कृपा शुरू होती है
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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: जब सामर्थ्य समाप्त हो जाती है, तो कृपा शुरू होती है

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56 मिनट पहले

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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar

पं. विजयशंकर मेहता

जो लोग अतिरिक्त रूप से योग्य होते हैं, वो अतिरिक्त रूप से अशांत भी हो जाते हैं। ऐसे परेशान लोगों के लिए तुलसीदास जी ने एक तरीका बताया है। अगर वो इसे अपनाते हैं, तो वो योग्यता का लाभ तो उठाएंगे पर उनको हानि नहीं मिलेगी। राम जी के गुरु वशिष्ठ जी ने कहा था- ‘सोइ सर्बग्य तग्य सोइ पंडित। सोइ गुन गृह बिग्यान अखंडित।। दच्छ सकल लच्छन जुत सोई। जाकें पद सरोज रति होई।।’

वही सर्वज्ञ है, तत्वज्ञ है, पंडित है, गुणों का घर है और अखंड विज्ञानवान है, चतुर और सब सुलक्षणों से युक्त है, जिसका आपके चरण-कमलों में प्रेम है। ये पांच बातें जिस किसी के भीतर हों, उसे अतिरिक्त रूप से योग्य मानना चाहिए।

और जब वो अशांत हो तो तुलसीदास जी ने इशारा किया है, ईश्वर के चरणों में प्रेम रखें। इसका मतलब एक ऐसी शक्ति पर भरोसा रखो, जो आपकी सारी योग्यता के ऊपर है। जब सामर्थ्य समाप्त हो जाती है, तो उसकी कृपा शुरू होती है। खूब आगे ​बढ़िए और शांत भी रहिए।

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