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- Pawan K Verma Column | Election Commission Credibility & Controversy
6 घंटे पहले
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पवन के. वर्मा पूर्व राज्यसभा सांसद व राजनयिक
एसआईआर को लेकर चल रहे विवाद में एक दिलचस्प विसंगति दिखलाई देती है। यह कि विपक्षी दल तो चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन आयोग स्वयं अपने कामकाज को लेकर उठाए जा रहे सवालों का जवाब देने से कतरा रहा है।
खबरों के अनुसार तीन में से दो निर्वाचन आयुक्तों- सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों के दौरान कम से कम 14 मौकों पर एसआईआर से जुड़े फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्तियां दर्ज की थीं। बताया गया कि ये आपत्तियां फॉर्म 6 में किए गए बदलावों, मतदाता सूची से संबंधित सॉफ्टवेयर पर नियंत्रण के केंद्रीकरण, बंगाल में मतदाताओं के नाम बहाल किए जाने के खिलाफ अपीलों और ऐसे फैसलों से जुड़ी थीं, जिन्हें कथित तौर पर पूरे आयोग की जानकारी या मंजूरी के बिना लिया गया था।
ये गंभीर आरोप हैं। इनके कारणों की व्याख्या संभव है, लेकिन इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जब उस तंत्र की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं, जिसके माध्यम से भारतीय नागरिक लोकतांत्रिक भागीदारी के अपने सबसे बुनियादी अधिकार का प्रयोग करता है, तो उन सवालों का जवाब देने की पूरी जिम्मेदारी भी उसी तंत्र की होती है।
इसके बजाय, निर्वाचन आयोग ने एक प्रेस नोट जारी कर कहा कि आंतरिक टिप्पणियां और आपत्तियां चुनावी प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने के लिए संस्थागत विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं। आयोग ने यह भी दावा किया कि पिछले एक वर्ष के दौरान आयोग द्वारा लिए गए सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे।
लेकिन यह नहीं बताया गया कि फॉर्म 6 में विवादित बदलाव को मंजूरी किसने दी, बंगाल में बहाल किए गए मतदाताओं के नामों के खिलाफ अपील दायर करने की अनुमति किसने दी, चुनावी सॉफ्टवेयर के ऑडिट की मांग पर उठाई चिंताओं का जवाब क्यों नहीं दिया गया या मई से अगस्त के बीच कथित तौर पर पूर्ण आयोग की बैठक क्यों नहीं हुई?
सर्वसम्मति का दावा करना और यह समझाना कि वह सर्वसम्मति कैसे बनी- दो अलग-अलग बातें हैं। प्रक्रियाएं सही हैं, यह आश्वासन देना इस बात का प्रमाण पेश करने का विकल्प नहीं हो सकता कि वे वास्तव में सही हैं। और संस्थागत ईमानदारी की घोषणा भर से संस्थागत आचरण के बारे में उठाए गए सवालों का जवाब नहीं दिया जा सकता।
इसलिए यह जरूरी है कि चुनाव आयोग एक प्रेस वार्ता बुलाए, जिसमें तीनों निर्वाचन आयुक्त मौजूद हों। उन्हें सवालों के जवाब देने चाहिए, संबंधित फैसलों और प्रक्रियाओं की व्याख्या करनी चाहिए, यह बताना चाहिए कि कौन-से रिकॉर्ड कानूनी रूप से सार्वजनिक किए जा सकते हैं, और स्पष्ट करना चाहिए कि दोनों आयुक्तों द्वारा उठाई गई आपत्तियों पर किस तरह विचार किया गया और उनका समाधान कैसे निकाला गया।
जब सत्तारूढ़ दल चुनाव आयोग के बचाव में उतरता है, तो वह अनजाने में उसी धारणा को और मजबूत कर बैठता है, जिसे वह दूर करना चाहता है- यह कि आयोग और सरकार राजनीतिक रूप से एक-दूसरे के साथ खड़े हैं। भाजपा ने चुनाव जीते भी हैं और हारे भी। उसे मानकर चलना चाहिए कि भविष्य में भी उसे इन दोनों परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
इसलिए ऐसा चुनाव आयोग उसी के दीर्घकालिक हित में नहीं है, जिसे तत्कालीन सरकार के प्रति सहानुभूति रखने वाला माना जाए। ऐसा आयोग वांछनीय है, जिसकी निष्पक्षता पर संदेह करने का कोई आधार न हो। यही सिद्धांत हर दल पर लागू होता है।
सभी राजनीतिक दलों को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि संविधान के अनुच्छेद 324(2) के तहत निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया में अधिकतम विश्वसनीयता हो। संसद द्वारा इस संबंध में कानून बनाए जाने के अभाव में, सर्वोच्च न्यायालय ने 2023 में निर्देश दिया था कि नियुक्तियों की सिफारिश प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और सीजेआई की समिति करे।
इसके बाद संसद ने एक कानून पारित किया, जिसमें सीजेआई की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री को शामिल कर लिया गया। इससे सरकार को समिति में संख्यात्मक बढ़त मिल गई। इस कानून की वैधता का मामला संविधान पीठ के विचारार्थ मुख्य न्यायाधीश के समक्ष लम्बित है।
मौजूदा विवाद को भाजपा और विपक्ष के बीच की लड़ाई तक ही सीमित नहीं कर देना चाहिए। चुनाव आयोग न तो भाजपा का है, न विपक्ष का। वह एक संवैधानिक संस्था है और उसे अपनी बात स्वयं रखनी चाहिए। भारत का लोकतंत्र इसका सुपात्र है।
मौजूदा विवाद को भाजपा और विपक्ष तक ही सीमित नहीं कर देना चाहिए। चुनाव आयोग न तो भाजपा का है, न विपक्ष का। वह एक संवैधानिक संस्था है और उसे अपनी बात स्वयं रखनी चाहिए। भारत का लोकतंत्र इसका सुपात्र है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)








