पीटर कर्षलैगर का कॉलम:  काम करने का प्रश्न मनुष्य के अस्तित्व की गरिमा से जुड़ा है
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पीटर कर्षलैगर का कॉलम: काम करने का प्रश्न मनुष्य के अस्तित्व की गरिमा से जुड़ा है

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जिसे हम आमतौर पर एआई कहते हैं, वह वास्तव में डेटा-बेस्ड सिस्टम्स (डीएस) का एक सेट है। ये तकनीकें इंसानी जीवन के हर पहलू को बदल रही हैं। नए बिजनेस मॉडल बढ़ा रही हैं और समूची अर्थव्यवस्थाओं को नए सिरे से गढ़ रही हैं। समय के साथ ये नई नौकरियां पैदा करने, उत्पादकता बढ़ाने और कॉग्निटिव क्षमताएं बढ़ाने का वादा करती हैं। लेकिन इन फायदों के साथ ही डिजिटल क्रांति और डीएस का यह प्रसार श्रम बाजार, शिक्षा और प्रोफेशनल ट्रेनिंग को बाधित भी कर रहा है। परिणाम साफ दिखने लगे हैं- एल्गोरिदम-आधारित प्लेटफॉर्म्स द्वारा तैयार जोखिमपूर्ण कार्य-स्थितियां, घटती मजदूरी और अर्थव्यवस्था की जरूरतों व कामगारों के प्रशिक्षण के बीच बढ़ता असंतुलन। इस सब से यह बुनियादी सवाल खड़ा होता है कि क्या एआई का बढ़ता इस्तेमाल वेतन या मजदूरी वाले पेशेवर काम को अप्रासंगिक कर देगा? हमें अकसर बताया जाता है कि तकनीकी छलांग ने हर बार बड़े पैमाने पर बेरोजगारी की आशंकाएं पैदा कीं और हर बार ये गलत ही साबित हुईं। लेकिन ये ऐतिहासिक पैटर्न अब शायद काम न करे। मोटे तौर पर अतीत की तकनीकें मानव श्रम को अधिक कुशल या शारीरिक रूप से कम मेहनत वाला बनाने के लिए विकसित हुई थीं। इसके उलट, एआई इंसान को वैल्यू-चेन से हटा देने पर आमादा है। पिछली तकनीकी क्रांतियों के विपरीत एआई सिस्टम्स महज सामान्य या कम-कौशल वाले कामों तक सीमित नहीं हैं। ये उन क्षेत्रों में भी बढ़ रहे हैं, जो कभी मानवीय विशिष्टता में शामिल थे, जैसे चिकित्सा और सर्जरी, कानूनी विश्लेषण या रचनात्मक सृजन। आज एआई के विस्तार और गति से उस भरोसे को चुनौती मिल रही है कि तकनीकी इनोवेशंस हमेशा जितनी नौकरियां खत्म करते हैं, उससे अधिक पैदा करते हैं। वस्तुत: ऐसा कोई ऐतिहासिक नियम है ही नहीं, जो यह गारंटी देता हो कि तकनीकी बदलाव अनिवार्य रूप से इंसानों के लिए अधिक पेड-वर्क पैदा करेगा। इसके विपरीत, सामने आ रहे प्रमाण बताते हैं कि जिस गति से नई नौकरियां पैदा हो रही हैं, उससे कहीं ज्यादा तेजी से एआई पूरे के पूरे पेशों को ही समाप्त कर रहा है। यकीन मानिए कि काम का कम समय और अधिक फ्री-टाइम जरूरी तौर पर बुरा नहीं। अत्यधिक श्रम से मुक्त कोई समाज अधिक रचनात्मक हो सकता है। खतरा काम खत्म होने से नहीं, बल्कि इसके साथ समाप्त होने वाली चीजों से है। जैसे, वेतन, जनहित में काम आने वाला टैक्स-आधार और रोजगार से मिलने वाली पहचान, प्रयोजन-भावना, अस्मिता और साथ काम करने वाले लोगों के बीच का सौहार्द। जब आर्थिक मूल्य पैदा करने के लिए कम से कम लोगों की जरूरत होगी तो नीति-निर्माताओं को श्रम बाजार पर एआई का असर स्वीकारना ही होगा। ऐसे में दांव पर देशों की वो प्रतिबद्धता है, जिसमें अधिक से अधिक रोजगार पैदा करने पर जोर होता है। अस्तित्व खो चुके किसी जॉब-मार्केट के प्रति लोगों को कुशल होने के लिए कहना इन बदलावों के लिए ऐसे व्यक्तियों को जिम्मेदार ठहराना होगा, जिनका उन पर कोई नियंत्रण ही नहीं है। जबकि जरूरत ऐसे पॉलिसी फ्रैमवर्क की है, जो इस बदलाव की व्यापकता के अनुरूप हो। ऐसे में हमें ‘सोसाइटी, आंत्रप्रेन्योरशिप और रिसर्च-टाइम’ (एसईआरटी) मॉडल को अपनाना होगा, जो आय को काम से पृथक करता है, लेकिन बिना शर्त नहीं। इसका उद्देश्य गरिमापूर्ण जीवन और मानवाधिकारों के साथ मानवीय अस्तित्व की आवश्यकताएं पूरा करना है। लेकिन अगर दुनिया ने बिना किसी सामूहिक प्रतिक्रिया के एआई को मानव श्रम को विस्थापित करने दिया तो यह असमानता और अन्याय बढ़ाएगा। इससे राजनीतिक अस्थिरता पैदा होगी और सामाजिक ताना-बाना कमजोर होगा। एआई के विस्तार और गति से इस भरोसे को चुनौती मिल रही है कि तकनीकी इनोवेशंस हमेशा जितनी नौकरियां खत्म करते हैं, उससे अधिक पैदा करते हैं। इसके उलट आज एआई पूरे के पूरे पेशों को ही खत्म कर रहा है। (@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)



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