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शून्य से शिखर तक पहुंचने वाला एक व्यक्ति अपना ‘विकास’ किसे मानेगा? पैसे, पद, प्रतिष्ठा को या अच्छी गुणवत्ता वाले जीवन-स्तर, बौद्धिक विकास, मन की शांति और खुशी को? इससे भी आगे, अपने दायरे में आने वाले लोगों की जिंदगियां बेहतर करने को? शायद इस सभी को, लेकिन सिर्फ बड़ा बंगला, बड़ी गाड़ी विकास नहीं हो सकता। 2047 में विकसित देश बनने से हमारे देश को कोई नहीं रोक सकता। ट्रम्प का टैरिफ भी नहीं। अब हमारे पास “मां’ भी है। मदर ऑफ ऑल डील्स! सवाल इतना-सा है कि विकसित होते देश की हवा जहरीली, पानी मृत्यु देने वाला, भोजन कैंसर कोशिकाएं बनाने वाला और दवाइयां मौत के और करीब ले जाने वाली (नकली) कैसे हो सकती हैं? क्या हमारे विकास मॉडल के केंद्र में इकोनॉमी तो होगी मगर इंसान न होगा? विकसित बन किसके लिए रहे हैं? दुनिया को दिखाने के लिए या अपनों को आगे ले जाने के लिए? दुनिया को तो बुलंदी से बढ़ता भारत दिख ही रहा है। लेकिन दुनिया को यह भी दिख रहा है कि भारत में निवेश करने जाएंगे तो दिल्ली में लैंड करते ही फेफड़े लड़खड़ाने लगेंगे, सांस उखड़ने लगेगी। विश्व बैंक की 2022 की रिपोर्ट बताती है कि भारत में हर साल 17 लाख लोगों की मौत प्रदूषण से होती है। क्या सरकार ने तय किया है कि हम किस तरह के विकसित देश बनना चाहते हैं? अमेरिका जैसे, जो इंसान छोड़ इकोनॉमी को केंद्र में मान चुका है? सुनते थे कि अमेरिका में एक भी असामान्य मौत हो जाए तो वह जमीन-आसमान एक कर देता है। लेकिन मिनियोपोलिस में एक व्यक्ति को फेडरल एजेंटों ने ही गोली मार दी, महिला को गाड़ी में शूट कर दिया। ट्रम्प सुरक्षा बल के पक्ष में ही खड़े हो गए जबकि पूरे देश में आंदोलन चल रहा है। दुनिया पर मनमानी करते आए इस देश में 2021 के बाद से आम आदमी का जीवन-स्तर और क्रय-शक्ति गिरते चले गए। एक तिहाई मध्यमवर्गीय परिवार भोजन और स्वास्थ्य की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहे हैं। दूसरी तरफ, कहीं कम जीडीपी वाले विकसित देशों ने विकास की अपनी परिभाषा गढ़ी है। स्कैंडिनेवियाई देश नाॅर्वे, स्वीडन, फिनलैंड एचडीआई यानी मानव विकास सूचकांक पर ज्यादा ध्यान देते हैं। इनका मंत्र है- बचपन से बुढ़ापे तक सुरक्षा। फिनलैंड में शिक्षा मुफ्त है, निजी स्कूल न के बराबर। नॉर्वे अपनी प्राकृतिक संपदा का उपयोग नागरिकों के लिए वेलफेयर फंड बनाने में करता है। वहां स्वास्थ्य सेवाएं लगभग मुफ्त हैं। जापान ने लंबी उम्र और स्वास्थ्य सेवाओं को अपना मुख्य आधार बनाया है। यहां सड़कें सुरक्षित हैं, आपदा प्रबंधन गजब का है और ट्रेनें मिनटों की सटीकता से चलती हैं। प्रसिद्ध कोलंबियाई अर्थशास्त्री गुस्तावो पेट्रो ने कहा था- एक विकसित देश वह नहीं है जहां गरीबों के पास कारें हों, बल्कि वह है जहां अमीर सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करते हों। इधर, हमारे देश में 2047 तक आधी आबादी शहरों में रह रही होगी। उन शहरों में जहां ट्रैफिक बेकाबू हो चुका है, हवा-पानी जहरीले हैं, 90 डिग्री के फ्लाईओवर बन रहे हैं, गिर रहे हैं। स्थानीय निकाय और एजेंसियां गैर-जिम्मेदार हैं। इन्फ्रास्ट्रक्चर और ट्रांसपोर्ट में मंत्री-अफसर का कमीशन और ठेकेदार का मुनाफा बढ़ता जा रहा है। एक विकासशील देश में कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं। लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि सरकार की प्राथमिकताएं क्या हैं? वह अपनी नीतियों से किस तरह की संस्कृति बना रही है? नोबेल विजेता जोसेफ स्टिग्लिट्ज कहते थे- विकास का मतलब जीवन को बदलना है, सिर्फ अर्थव्यवस्था को नहीं। अगर जीडीपी बढ़ रही है और लोगों का स्वास्थ्य व खुशहाली नहीं, तो वह विकास एक धोखा है। भावनात्मक मुद्दे चुनाव जिता सकते हैं लेकिन विकास के ब्लू प्रिंट में उस मतदाता की परवाह तो कीजिए जो आपको जिताएगा। अगर जीडीपी बढ़ रही है और लोगों का स्वास्थ्य व खुशहाली नहीं, तो वह विकास एक धोखा है।
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