प्रियदर्शन का कॉलम:  एक युद्ध से निकलकर दूसरे की ओर चली जाती मनुष्यता
टिपण्णी

प्रियदर्शन का कॉलम: एक युद्ध से निकलकर दूसरे की ओर चली जाती मनुष्यता

Spread the love




अपनी कविता ‘युद्ध नायक’ में श्रीकांत वर्मा लिखते हैं- ‘अभी / कल ही की तो बात है / ढाका / एक मांस के लोथड़े की तरह / फेंक दिया गया था / युद्ध कब शुरू हुआ था हिन्द-चीन में? / हृदय में दो करोड़ साठ लाख घाव लिए / वियतनाम / बीसवीं सदी के बीच से गुजरता है / अभी / कल ही की तो बात है / यूरोप / एक युद्ध से निकलकर / दूसरे युद्ध की ओर / इस तरह चला गया था / जैसे कोई नींद में चलता हुआ व्यक्ति।’ इस कविता का कालखंड कुछ बदलें- ढाका को गाजा पढ़ें, वियतनाम को इराक, अफगानिस्तान या आने वाला ईरान, यूरोप को अमेरिका- तो लगेगा दुनिया फिर उसी दौर में है- अहंकार और प्रमाद में डूबे नेताओं के टकराव के बीच विश्वयुद्ध की ओर बढ़ती हुई। रूस-यूक्रेन, इजराइल-हमास, भारत-पाकिस्तान, आर्मेनिया-अजरबैजान, अमेरिका-ईरान- ये सब या तो निकट अतीत में लड़ चुके या वर्तमान में लड़ रहे हैं या भविष्य में लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। रूस और अमेरिका के बीच जो स्टार्ट- यानी स्ट्रैटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी- संधि थी, वह 5 फरवरी को खत्म हो चुकी है और उसे आगे बढ़ाने में दोनों पक्ष दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। अमेरिका ने वेनेजुएला में दादा की तरह जैसी घुसपैठ की, उसके बाद चीन ताइवान में घुसने का मौका खोज रहा हो तो अचरज नहीं। कभी कहते थे अगला विश्वयुद्ध पेट्रोल के लिए होगा, फिर कहा गया पानी के लिए होगा, लेकिन अब लग रहा है कि पेट्रोल हो या पानी, ये सब राजनीतिक वर्चस्व के औजारों और बहानों की तरह ही इस्तेमाल किए जाएंगे। लेकिन यह नौबत क्यों आ रही है? दो विश्वयुद्धों का हिसाब जोड़ें तो करीब दस करोड़ लोग उनमें मारे गए थे। आज जब कुछ देशों के पास धरती को कई बार मिटा देने लायक एटमी हथियारों का जखीरा है, तब ऐसे युद्ध में विनाश कितना बड़ा होगा- क्या इसकी कल्पना किसी को है? क्या हम वाकई आइंस्टाइन के बताए जाने वाले इस मजाक को सच करने जा रहे हैं कि तीसरा विश्वयुद्ध जिन भी हथियारों से लड़ा जाए, चौथा पत्थरों से लड़ा जाएगा, क्योंकि मानव सभ्यता को बिल्कुल शून्य से शुरुआत करनी होगी? वह शुरुआत हो भी पाएगी या नहीं, कहना मुश्किल है, क्योंकि तब यह धरती अरबों बरस पहले की तरह जंगलों और समंदरों से भरी नहीं होगी, यह जल कर खाक हो चुके किसी अग्निपिंड की सूख रही राख भर होगी। यह डरावनी कल्पना लगती है। लेकिन यह कल्पना भी इसलिए मुमकिन हो पा रही है कि दुनिया के बड़े और ताकतवर देशों के शीर्ष पर कई डरावने और संदिग्ध लोग बैठे हैं। क्या यह लोकतंत्र की नाकामी या विचारधाराओं की विफलता का प्रमाण है? क्या यह रुग्ण और वृद्ध पूंजीवाद के आगे व्यर्थ बनाई जा चुकी नैतिकता और मूल्यों के ह्रास का मामला है? क्या यह एक मुनाफाखोर मुक्त बाजार का खेल है, जिसमें एक तरफ ऐप्स्टीन फाइलें निकलती हैं और दूसरी तरफ राष्ट्रवाद और साम्प्रदायिकता की, साम्यवाद और सैन्यवाद की गलबहियां दिखती हैं? क्या ये रुग्ण, मुनाफालोलुप और सत्ताप्रेमी लोग खुद को बचाने के लिए युद्धवाद की शरण ले रहे हैं? इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं। अपनी किताब ‘सेकंड वर्ल्ड वॉर’ की भूमिका में चर्चिल ने लिखा है कि उनसे रूजवेल्ट ने पूछा था कि इस युद्ध को क्या नाम दिया जाए। चर्चिल ने जवाब दिया- यह ‘फ्यूटाइल वॉर’ था- बेमानी युद्ध- और इसे अन्य युद्धों के मुकाबले ज्यादा आसानी से रोका जा सकता था। 21वीं सदी के 25 बरस बीतने के बाद एक बार फिर हम ऐसे ही मोड़ पर खड़े हैं, जहां कई बेमानी युद्ध हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। इन युद्धों को शुरू करना जितना आसान है, रोकना भी उतना ही आसान है- लेकिन क्या कोई इस दिशा में पहल कर रहा है? जहां मुल्कों को राजनीतिक नक्शों की रेखाएं मिटाने की तरफ बढ़ना चाहिए, वहां हम नई रेखाएं खींचने पर आमादा हैं- देशों के बीच भी और समुदायों के बीच भी। युद्धों को शुरू करना आसान है तो रोकना भी तो कठिन नहीं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *