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मतदाता सूची के शुद्धीकरण का सात्विक इरादा लेकर चुनाव आयोग द्वारा देश भर में चलाए जा रहे एसआईआर अभियान के नतीजे अलबत्ता कुछ और ही संकेत कर रहे हैं। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल और उनके परिजनों तक को नोटिस चला गया है कि वे साबित करें कि पहले भी वे दिल्ली के वोटर रहे हैं। खुद एक चुनाव आयुक्त सहित कई जाने-पहचाने नेताओं को ऐसा ही नोटिस गया है। इसके पहले बेंगलुरु में भी नंदन नीलेकणी को ऐसा ही नोटिस दिया गया था। वैसे केजरीवाल, नीलेकणी या दूसरे लोगों को फिक्र करने की जरूरत नहीं है। ये वे कद्दावर हैं, जिनके नामों या ब्योरों में मिलने वाली असंगतियां चुनाव आयोग उनके घर जाकर दूर कर देगा। लेकिन 2002 की मतदाता सूचियों से हर्फ-दर-हर्फ मिलान और पुष्टि का चुनाव आयोग का उत्साह उन करोड़ों मतदाताओं पर भारी पड़ रहा है, जिन्हें याद नहीं है कि उस समय वे या उनके मां-पिता कहां थे, उन्होंने कहां वोट दिए थे, उस समय उनके विधानसभा क्षेत्रों के नाम क्या थे, या उन दिनों मतदाता सूची में उनके नाम किस तरह दर्ज थे। ये सवाल उन गरीब, कमजोर लोगों को ज्यादा संकट में डालने वाले हैं, जो नौकरी या रोजगार की मजबूरी में शहर-शहर, बस्ती-बस्ती भटकते और काम करते रहे हैं, उन महिलाओं के लिए मुसीबत बन रहे हैं जिनके नाम शादी के बाद बदल गए या जिनको खयाल नहीं आ रहा कि तब उनके नामों की वर्तनी क्या थी। इसके नतीजे हम बंगाल में देख चुके हैं, जहां 91 लाख वोटरों के नाम कटे। इनमें करीब 22 लाख ऐसे थे, जिन्होंने चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती दी, अपने कागज जुटाए और इंतजार करते रहे कि उन्हें वोट देने का अधिकार मिलेगा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की यह बात मान ली कि इन सबकी जांच के बाद ही इन्हें वोट देने का अधिकार दिया जा सकता है। चुनाव खत्म हो गए, अभी तक दावों की जांच जारी है और लाखों लोगों का वोट देने का अधिकार स्थगित या लम्बित है। इधर खबर आई है कि बंगाल एसआईआर ट्रिब्यूनल को प्राप्त हुई लाखों अपीलों के निराकरण में 12 वर्ष तक का समय लग सकता है और इस अवधि में प्रभावित मतदाता एक दशक से अधिक समय तक अपने मताधिकार का उपयोग नहीं कर सकेंगे! चुनाव आयोग तो कहता है कि सबकी सुनवाई होगी, लेकिन जिसके पास कागज नहीं है, उसका क्या होगा? मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने हाल में यह भी कहा कि जिनके नाम मतदाता सूची में नहीं हैं, उन्हें सरकारी योजनाओं का भी लाभ नहीं मिलेगा। यह एक तरह से लोगों से उनके नागरिक अधिकार छीनना है। निश्चय ही, लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए मतदाता-सूचियों में निरंतर सुधार और संशोधन एक अपरिहार्य प्रक्रिया है। लेकिन जिस तरह बीते कुछ अरसे में इस प्रक्रिया को अंजाम दिया जा रहा है, उसको लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। लोकतंत्र के लिए जितना जरूरी यह है कि उसमें एक भी फर्जी या अवैध वोट न डाला जाए, उतना ही यह भी जरूरी है कि किसी भी पात्र नागरिक को उसके वोट देने के हक से वंचित न किया जाए। बांग्लादेशी या अन्य विदेशी घुसपैठियों को मतदान की प्रक्रिया से बाहर रखने की कवायद में कितने ऐसे घुसपैठिए मिले हैं, इसकी कोई संख्या अभी तक चुनाव आयोग ने नहीं दी है। यह अनायास नहीं है कि विपक्ष इस अभियान को संदेह की नजर से देख रहा है और अदालतों में इसे चुनौती दी जाती रही है। लेकिन अंतत: यह देश के लोकतंत्र का, उसके नागरिकों के बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकारों का भी सवाल है। इसमें किसी प्रकार की कोई चूक, कोई हड़बड़ी न हो, और हर किसी का नाम सहज ढंग से शामिल हो सके- यह देखना राज्य का दायित्व है, जो उसे चुनाव आयोग के मार्फत पूरा करना है। मतदाता-सूचियों में सुधार और संशोधन एक अपरिहार्य प्रक्रिया है। लेकिन लोकतंत्र के लिए जितना जरूरी यह है कि उसमें एक भी फर्जी या अवैध वोट न डाला जाए, उतना ही यह भी जरूरी है कि किसी भी पात्र नागरिक को उसके वोट देने के हक से वंचित न किया जाए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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