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लोक कथा है- पुराने समय में एक साधु रोज भिक्षा मांगने एक गांव में जाता था। एक दिन वह एक घर के सामने पहुंचा। उस घर से एक महिला बाहर आई और बोली, “महाराज, आज कोई ज्ञान की बात बताइए, तभी मैं आपको भिक्षा दूंगी।” साधु मुस्कुराया और बोला, “आज नहीं, कल बताऊंगा।” इतना कहकर वह बिना भिक्षा लिए ही वहां से चला गया। अगले दिन महिला ने स्वादिष्ट खीर बनाई। कुछ देर बाद वही साधु भिक्षा मांगने उसके दरवाजे पर आया। महिला ने प्रसन्न होकर एक कटोरे में खीर ली। साधु ने अपना कमंडल उसके सामने रख दिया। महिला खीर डालने ही वाली थी कि उसकी नजर कमंडल के अंदर गई। उसमें धूल, कंकड़ और गंदगी भरी थी। उसने कहा, “महाराज, आपका कमंडल तो बहुत गंदा है। इसमें खीर डालूंगी तो खीर भी खराब हो जाएगी।” साधु ने कहा, “तुम इसकी चिंता मत करो, बस खीर डाल दो।” महिला ने उत्तर दिया, “नहीं महाराज। पहले इसे साफ करना जरूरी है। अगर पात्र ही गंदा होगा तो उसमें रखा अच्छा भोजन भी दूषित हो जाएगा।” साधु ने मुस्कुराकर पूछा, “अगर कमंडल साफ कर दिया जाए और फिर उसमें खीर डाली जाए तो?” महिला बोली, “तब खीर खराब नहीं होगी। आप आराम से उसे खा सकेंगे।” साधु ने कहा, “यही वह ज्ञान है जो मैं तुम्हें देने आया हूं।” महिला आश्चर्य से साधु को देखने लगी। साधु ने कहा, “कल तुमने ज्ञान पाने से पहले मुझे परखना चाहा था। तुम्हारे मन में संदेह, अहंकार और पूर्वाग्रह की गंदगी थी। ऐसे मन में दिया गया ज्ञान भी टिक नहीं सकता। जिस प्रकार गंदे कमंडल में खीर नहीं डाली जा सकती, उसी प्रकार अशांत और नकारात्मक मन में अच्छी सीख अपना प्रभाव नहीं छोड़ सकती।” महिला को अपनी गलती समझ में आ गई। उसने साधु से क्षमा मांगी और मन को शुद्ध रखने का संकल्प लिया। जीवन में ज्ञान की कमी से ज्यादा समस्या कई बार हमारे भीतर जमा नकारात्मकता होती है। इसलिए दूसरों को बदलने से पहले अपने मन को साफ करना जरूरी है। प्रसंग की सीख
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