प्रो. मनोज कुमार झा का कॉलम:  कहने का सलीका हो तो गैर-सलीकेदार बात भी ढंग से कह सकते हैं
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प्रो. मनोज कुमार झा का कॉलम: कहने का सलीका हो तो गैर-सलीकेदार बात भी ढंग से कह सकते हैं

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9 घंटे पहले

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प्रो. मनोज कुमार झा राजद से राज्यसभा सांसद - Dainik Bhaskar

प्रो. मनोज कुमार झा राजद से राज्यसभा सांसद

लोकतंत्र की असली पहचान केवल चुनावों से ही नहीं, बल्कि इस बात से भी होती है कि वह असहमति को किस भाषा में व्यक्त करता है। राजनीति की भाषा समाज की संस्कृति गढ़ती है। जब संवाद में संयम, सम्मान और संवेदनशीलता होती है, तब लोकतंत्र मजबूत होता है। लेकिन जब भाषा अपमान, कटुता और उत्तेजना से भर जाती है, तब विरोध दुश्मनी में बदलने लगता है।

आज सार्वजनिक जीवन में यही सबसे बड़ी चिंता है। भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा ने हमेशा गरिमापूर्ण असहमति को महत्व दिया है। इसलिए आवश्यक है कि राजनीति आलोचना को बनाए रखे, लेकिन संवाद की मर्यादा और व्यक्ति की गरिमा को न छोड़े।

आज भारतीय लोकतंत्र के सामने जो सबसे गहरा संकट दिखाई देता है, वह केवल संस्थाओं का नहीं, बल्कि संवाद की संस्कृति का है। संसद से लेकर टीवी स्टूडियो तक, चुनावी मंचों से लेकर सोशल मीडिया तक- हर जगह भाषा में संयम कम हुआ है और आक्रामकता बढ़ी है। विचारों की जगह विशेषणों ने ले ली है, तर्क की जगह तंज ने और संवाद की जगह शोर ने। और इस शोर में ऐसा लगता है जैसे लोकतंत्र अब विमर्श नहीं, भौंडे प्रदर्शन का मंच बनता जा रहा है।

हमें बिसराना नहीं चाहिए कि लोकतंत्र केवल चुनावों और सरकारों का नाम नहीं होता। वह मूलतः संवाद की एक सतत प्रक्रिया है- जहां सहमति और असहमति दोनों को स्थान मिलता था और मिलना चाहिए भी। लेकिन संवाद तभी संभव है जब भाषा में गरिमा बरकरार रहे और सम्मान बचा रहे।

असहमति लोकतंत्र की स्वाभाविक शक्ति है; उसे अपमान में बदल देना लोकतंत्र की आत्मा को आहत करना है। किसी विचार से तीखा विरोध हो सकता है, किसी नीति की कठोर आलोचना भी जरूरी हो सकती है, लेकिन व्यक्ति की गरिमा पर हमला लोकतांत्रिक संस्कार का हिस्सा नहीं।

हमारे समय की विडम्बना यह है कि अब भाषा का उद्देश्य समझाना कम और पराजित करना अधिक हो गया है। सार्वजनिक जीवन में शब्द अब पुल नहीं बनाते, खाइयां बनाते हैं। विरोधी विचार रखने वाला व्यक्ति तुरंत देशद्रोही, एंटी-नेशनल, गोदी, अर्बन नक्सल या किसी अन्य खांचे में डाल दिया जाता है। यह प्रवृत्ति केवल राजनीतिक असहमति को सीमित नहीं करती, समाज के भीतर संवाद की संभावनाओं को भी कमजोर करती है।

भारतीय लोकतंत्र की एक बड़ी खूबी उसकी विविधता रही है। यह देश अनेक भाषाओं, धर्मों, जातियों और संस्कृतियों का साझा घर है। ऐसे समाज में संवाद की भाषा स्वाभाविक रूप से संवेदनशील और समावेशी होनी चाहिए। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राजनीति का स्वर अधिक विभाजनकारी हुआ है। हम बनाम वे की मानसिकता ने भाषा को भी प्रभावित किया है। अब संवाद का उद्देश्य समाधान खोजना नहीं, बल्कि विरोधी को नैतिक रूप से बुरा साबित करना बनता जा रहा है।

सोशल मीडिया ने इस संकट को और गहरा किया है। यह सच है कि सोशल मीडिया ने संवाद को लोकतांत्रिक बनाया, लेकिन उसने संवाद की गरिमा को भी कमजोर किया है। अब किसी विचार की गंभीरता से अधिक उसकी वायरल होने की क्षमता महत्वपूर्ण हो गई है। संयमित और विवेकपूर्ण बातों की तुलना में उत्तेजक टिप्पणियां अधिक तेजी से फैलती हैं।

ट्रोल संस्कृति ने असहमति को गाली में बदल दिया है। अब यह कम महत्वपूर्ण है कि किसने बेहतर तर्क दिया; अधिक महत्वपूर्ण यह हो गया है कि किसने अधिक आक्रामक प्रतिक्रिया दी। इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कौन सत्ता में है, बल्कि यह है कि हम एक-दूसरे से किस भाषा में बात कर रहे हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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